ममता, करुणा, वात्सल्य से भरी ‘गौ’ माता को मिले संरक्षण

ममता, करुणा, वात्सल्य से भरी ‘गौ’ माता को मिले संरक्षण

गौ में माँ जैसी ममता, करुणा और वात्सल्य है, वह मानव मात्र का हित करने वाली है। ऐसे संवेदनशील प्राणी के लिए ऋग्वेद ‘गावो विश्वस्तर मातरः’ अर्थात् गाय विश्व की माता कहता है। अग्निपुराण-‘गावोः पवित्र्या मांगल्या गोषुः लोकाः प्रतिष्ठा’ अर्थात् गाय को पवित्र और मंगलदायिनी बताता है। इसीलिए यजुर्वेद गाय को ऐसा प्राणी मानता है जिसका कोई भी मूल्य नहीं दे सकता, क्योंकि गाय अमूल्य है ‘गोस्तु मात्र न विद्यते’।

परम पूज्य श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं ‘गौ’ की हमारे पूर्वज इसलिए पूजा व रक्षा करते थे क्योंकि ‘गौ’ में माँ जैसी ममता, करुणा और वात्सल्य है, वह मानव मात्र का हित करने वाली है। पूज्यवर तो इस सृष्टि में मानव की तरह ही सम्पूर्ण जीवों के प्रति भी संवेदनशीलता, दया, करुणा भाव जन-जन में जगाने का संकल्प रखते हैं। जिससे सृष्टि के सुख, सौन्दर्य, आनंद को विकसित किया जा सके। वैसे हमारा भारत सत्य, अहिंसा एवं सदाचार के मूल्यों में विश्वास रखने वाला देश है। पर दुःखद कि गाय को लेकर हमारे समाज में एक बड़ा विरोधाभास है। एक ओर हम गाय को माता का स्थान देते हैं और गाय हमारी श्रद्धा हमारे प्रत्येक कर्म के साथ जुड़ी दिखाई पड़ती है। एक तरफ गौ ग्रास निकालने की परम्परा है, तो वहीं दूसरी ओर ‘गौ की हत्या’ की जाती है।

एक तरफ बताया जाता है कि गाय के दूध, दही, घी आदि से शरीर पुष्ट होता है। मूत्र में औषधीय गुण हैं, गोबर कृषि के लिए खाद का कार्य करता है और गौवंश से श्रेष्ठ खेती होती है। स्वावलम्बी जीवन-यापन की श्रृंखला गाय के साथ जुड़ी है। भगवान कृष्ण के साथ गोपाल, गोविन्द नाम उनकी गाय भक्ति के कारण ही जुड़ा है। भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप ने तो स्वयं वन में जाकर गाय की सेवा की थी। गाय के ये अनंत उपकार और मातृत्व सहित अनन्त भाव के बावजूद हम उसे
प्रताणित करने से बाज नहीं आते, जो दुःखद है। आज भी उस श्रद्धा के कारण हिन्दू समाज उसे पूजनीय मानता है, परन्तु अपनी दिनचर्या-जीवनशैली में धीरे-धीरे बदलाव से हम गौ माता से दूर होते जा रहे हैं।

यंत्रीकरण से खेती में किस प्रकार की तबाही हो रही है यह जगजाहिर है। लाखों, करोड़ों की सब्सिडी दी जाती है रासायनिक खाद के नाम पर उसके बाद भी किसान परेशान है और खेती हानि का धंधा बनती जा रही है। इसका कारण है कृषि का गाय से दूर होते जाना। गाय और गोवंश के कृषि प्रक्रिया से बाहर हो जाने पर न केवल धरती बंजर हो रही है, अपितु मानव के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो गया है। रासायनिकी से मानव के स्वास्थ्य एवं सुख-शांति पर गम्भीर संकट आ गया है, जिस पर ध्यान देना होगा। यद्यपि वैज्ञानिक

शोधों ने सिद्ध कर दिया है कि जो तत्व गाय के दूध में हैं, स्वास्थ्य एवं औषधीय दृष्टि से वह अन्य किसी भी दूध में नहीं है। गोमूत्र में कैंसर तक को ठीक करने के औषधीय गुण हैं। पर यह कहने मात्र से काम नहीं चलेगा, अपितु हमें इसे संरक्षण देना होगा। विश्व जागृत मिशन गाय की सेवा से लेकर उसके संरक्षण-
संवर्धन की दिशा में प्रयत्नशील है। आइये! आप सब भी गुरु के इस अभियान में हाथ बटायें। इस राष्ट्रीय और
धार्मिक आंदोलन से जुड़कर आप सभी उसे गति प्रदान करें। तभी जीवन का संतुलन ठीक रहेगा।

आनन्दधाम यज्ञ परिसर भी, श्रीयंत्र पीठ भी

आनन्दधाम यज्ञ परिसर भी, श्रीयंत्र पीठ भी
आनन्दधाम यज्ञ परिसर भी, श्रीयंत्र पीठ भी
हमारे धर्मशास्त्रें में गुरु ज्ञानियों के माध्यम से सिद्धियां प्राप्त करने की अनेकानेक विधियां बताई गई हैं। ज्ञान, योग, भक्ति, वैराग्य अनेक साधन परलोक को सुधारने और मुक्ति प्राप्त करने वाले बतलाए गए हैं, इसी प्रकार सांसारिक कार्यों में कृतार्थ होने के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ, जप-तप, यंत्र-मंत्र आदि का विधान है, पर सबसे महत्वपूर्ण है श्रीयंत्र की साधना। मंत्र विज्ञान के साथ श्रीयंत्र साधना की अद्भुत प्रणाली साधक शिष्यों को पूज्य सद्गुरु महाराज जी ने सहजता से सबके लिए आननदधाम में सुलभ करवाया है।
सुख-समृद्धि से जुड़ी अमृत संजीवनी को दिलाने वाली इस साधना से जुड़कर साधक धन्य हो, उनका लोक-परलोक सुधरे, उनकी साधना मुक्ति और भुक्ति दोनों प्रदान करे यही तो गुरुवर का लक्ष्य है। पूज्यवर यह भी चाहते हैं कि साधकों में वर्ष भर के लिए अक्षय वैभव भण्डार भरे, इसके लिए लक्ष्मी-गणेश यज्ञ द्वारा श्रीयंत्र साधना की व्यवस्था प्रतिवर्ष करते हैं।
यज्ञीय-मंत्रों के साथ श्रीयंत्र को सिद्ध कर लोगों के कष्ट-क्लेशों को सुख-शांति में बदलने वाली यह आध्यात्मिक शक्ति आज से हजारों वर्ष पहले तपस्वी ऋषि-मुनि, संतों-महात्माओं, महापुरुषों को प्राप्त थी, वही शक्ति हमारे पूज्य गुरुवर समय-समय पर ‘मंत्र, पूजा, ध्यान आदि साधना शिविरों’ द्वारा साधक शिष्यों को प्रदान करते आ रहे हैं। शिष्य स्वकल्याण के साथ पारमार्थिक जीवन जीते हुए यह यज्ञ-मंत्र-यंत्र विधि प्रतिवर्ष हजारों साधक गुरुवर से प्राप्त कर अपने को धन्य अनुभव करते हैं।
असंख्यों का जीवन इन समृद्धियों से दिव्यता के पार सुख समृद्धि तक पहुंचा है। त्याग-वैराग्य के सहारे दुनिया को ऐश्वर्य से पार ले जाने की आध्यात्मिक कला है हमारे यहां की ‘श्रीयंत्र साधना’।
आनन्दधाम में श्रीयंत्रः
श्रीयंत्र कोई आड़ी-तिरछी रेखा भर नहीं है, अपितु यह श्रीयंत्र ब्रह्माण्ड के मूल में छिपे सुख, शांति, समृद्धि के मूल रहस्य की कुंजी है। श्रीयंत्र की वही अपार महिमा आज भी व्याप्त है। पर इसकी साधना द्वारा शुभ उपलब्धि दिलाने की शक्ति देश के विरले संतों में ही है। पूज्य सदगुरु सुधांशु जी महाराज उन्हीं संतों में एक हैं। यहां के आनन्दधाम आश्रम परिसर में स्थित श्रीयंत्र अपने शिष्यों के सुख-समृद्धि व शांति के भण्डार को भरने के लिए ही स्थापित है। कहते हैं लक्ष्मी, विष्णु की शक्ति से युक्त यह यंत्र घर में स्थापित हो, तो जीवन में भौतिक, आध्यात्मिक सुखों का अभाव हो ही नहीं सकता।
श्रीयंत्र को घर में स्थापित करने एवं उसके संपूर्ण लाभ के लिए ऐसे संत को माध्यम बनाना चाहिए, जिसने इसकी साधना को सिद्धि में बदला है। पूज्यवर उसी स्तर के हैं। कहते हैं कि जिस तीर्थ व आश्रम
परिसर में श्रीयंत्र विधि पूर्वक स्थापित होता है, वहां के दर्शन मात्र से दुर्भाग्य दूर होते हैं। यदि उस परिसर
में निर्धारित शुभ तिथि पर विशेष श्री प्रार्थना-पूजन के साथ श्रीयंत्र को ‘सद्गुरु’ के हाथ से प्राप्त करके
घर में स्थापित करते हैं, तो जीवन सुख-शांति-समृद्धि एवं धनवैभव से भरा रहता है।
श्रीयंत्र विज्ञानः
श्री यंत्र के संदर्भ में शंकराचार्य जी कहते हैं-श्रीयंत्र भगवती त्रिपुरा सुंदरी का यंत्र है। श्रीयंत्र देवी लक्ष्मी का निवास स्थल, संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा विकास का प्रतीक व मानव के ऊर्जा शरीर का भी द्योतक है। इसलिए इसे सर्वव्याधिनिवारक, सर्वकष्टनाशक, सर्वसिद्धिप्रद, सर्वार्थ साधक, सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। गुरुदेव कहते हैं श्रीयंत्र भारतीय ऋषियों द्वारा अनुसंधित विशेष ऊर्जापूरक उपलब्धि है।
यह यंत्र ब्रह्मांडीय दिव्य ऊर्जा को आकर्षित कर साधक के चारों तरफ फैलाता रहता है। इसीलिए जो श्रीयंत्र के आभामंडल में आता है, उसको इसके दिव्य प्रभाव से शांति, स्वास्थ्य, सफलता एवं सम्पन्नता मिलती है। सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। इससे वास्तु, भूमि और गृहदोष दूर होते हैं। इसीलिए श्रीयंत्र को पौराणिक शास्त्रों में ‘यंत्र शिरोमणि’ (यंत्रराज) कहा गया है। विशिष्ट यज्ञ एवं मंत्रों से गुरुधाम में गुरु द्वारा आवाहित इस ‘श्रीयंत्र’ से मनुष्य के सातों ऊर्जा चक्रों में जागरण तक सम्भव है। इससे व्यक्ति स्वास्थ्य, लम्बा जीवन, सुख, सौभाग्य तथा सम्पन्नता प्राप्त करता है।
गणेश-लक्ष्मी यज्ञः
प्रत्येक वर्ष आनन्दधाम आश्रम में विश्वशांति, मानवकल्याण एवं यजमान भक्तों की सुख-समृद्धि के लिए श्रीगणेश-महालक्ष्मी के भव्य अर्चन के साथ पूज्य सद्गुरु महाराजश्री के कुशल निर्देशन और सान्निध्य, संरक्षण में कर्मकाण्डी विद्वानों द्वारा विधि पूर्वक साधकों के लिए प्रदत्त श्रीयंत्रें में प्राण प्रतिष्ठा की जाती है। 108 कुण्डीय श्रीगणेश-लक्ष्मी महायज्ञ में श्री गणेश-लक्ष्मी जी के चित्र के साथ श्रीयंत्र की विधिवत पूजा-अर्चना द्वारा पूज्यमहाराजश्री अपने समस्त गुरुभक्तों के लिए सुख-समृद्धि और आरोग्यता की मंगलकामना करते हैं। ताकि आनन्दधाम परिसर के इस विशिष्ट प्रयोग द्वारा साधक-शिष्य, गुरुभक्त इस सौभाग्य से जुड़ें और अपने जीवन को सुख-शांति, समृद्धि से भर लें। हमारे भारतीय ऋषियों ने यज्ञ एवं मंत्रों पर इसीलिए विशेष जोर भी दिया है। सम्पूर्ण वेद से लेकर उपनिषद, दर्शन तक में मंत्रों और यज्ञों का ही महत्व है।
मंत्र सिद्धि साधना भीः
मंत्र का आशय है जिस सूत्र को मनन करते हुए मन से तृप्त हुआ जा सकता है, जिसके सहारे मन, बुद्धि की सामान्य अवस्था से पार पहुंचा जा सकता है। दूसरे शब्दों में मंत्र वह आवाज, ध्वनि, विचार है, जो साधक के मन-बुद्धि के उस पार से ध्वनित होती है, उसे संवेदित करती हैं मन्त्र कहलाते हैं। ‘‘मन्त्र वह परावाक् है, जो सद्चेतना की अतिसूक्ष्म क्षमता से ओतप्रोत है, जिसके उच्चारण का प्रभाव साधक के प्राण, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, अन्तःकरण स्नायुतंत्र के साथ-साथ मानव के सम्पूर्ण षड्चक्रों पर पड़ता है। मानव के स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण तीनों शरीर झंकृत हो उठते हैं, व्यक्तित्व के अतल गहराई में समाये सद्गुणों के जखीरे अपना रहस्य खोलने लगते हैं।’’ पूज्यवर ‘‘मंत्र सिद्धि साधना’’ द्वारा अपने शिष्यों में यही वैभव तो उतारना चाहते हैं।
वास्तव में सद्विचारों से ही मनुष्य का निर्माण होता है, विचारों से ही वह ऊंचा उठता है। क्योंकि मंत्र स्वयं में ऊर्जा स्त्रोत्र है, जो सकारात्मक चिंतन के सहारे प्रगति, उत्थान मार्ग से जोड़ता है। पर विचारों के नकारात्मक होने से मनुष्य का पतन भी होता है। इसलिए मंत्र जप के साथ-साथ साधक का सद्विचारों को चिंतन के लिए सत्संग, स्वाध्याय, संत, गुरु जैसे महापुरुषों की संगत जरूरी होती है। तभी मंत्र साधक अन्तरात्मा में मंत्र ऊर्जा के साथ प्राण ऊर्जा को धारण कर पाता है और भगवान से अपना सम्बन्ध जोड़ पाता है।
आनन्दधाम का महायज्ञ महोत्सवः
सद्गुरु श्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं कि आज भी यज्ञ से वर्षा कराने, यज्ञ से शारीरिक, मानसिक व आत्मिक शक्तियों की पुष्टि कर प्राणशक्ति की अभिवृद्धि कराना, उत्तम संतान प्राप्ति, अक्षय कीर्ति का विस्तार, धन-लक्ष्मी व ऐश्वर्य की प्राप्ति आदि का शास्त्रों में वर्णन है। उसकी पूर्ति सम्भव है। गुरुवर चाहते हैं कि मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन ही यज्ञमय बने। परन्तु ऐसा सम्भव न बन सके, तो गुरु अनुशासन के विविध यज्ञों में सहभागीदार बनकर शिष्य व साधकों का अपने जीवन का सहज कायाकल्प सम्भव बनाया जा सकता है।
इस दृष्टि से आनन्दधाम आश्रम परिसर में सम्पन्न होने वाले श्री गणेश-लक्ष्मी यज्ञ के महत्व को विशेष
अद्भुत कहें तो आश्चर्य नहीं। यह ‘श्री गणेश-लक्ष्मी’ महायज्ञ जीवन, घर-परिवार में विवेक, श्री शक्ति,
ऐश्वर्य, सुख-स्वास्थ्य के आवाहन का विशिष्ट प्रयोग है।
इस महायज्ञ में गुरु सान्निध्य में साधक विवेक के प्रतीक, जीवन से विघ्नों को दूर करने वाले प्रथम पूज्य गणेश एवं साधनों व धन-वैभव की अधिष्ठात्री मां लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के साथ विशेष मंत्रों द्वारा आहुतियां दी जाती हैं। गुरु संरक्षण में कराये गये ऐसे अन्य विशिष्ट यज्ञों से साधकों पर वर्ष भर देव शक्तिधाराओं की कृपा बनी रहती है।
अतः आप सभी जब भी गुरु निर्देश मिले आनन्दधाम पधारिये और गुरु संकल्पित गणेश-लक्ष्मी यज्ञों, श्रीयंत्र स्थापन साधना, मंत्र सिद्धि साधना सहित विविध धर्म अनुष्ठानों में भागीदार बनें और जीवन में सुख-शांति- समृद्धि पाने का सुअवसर प्राप्त करें।

कल्पना सृजन का प्रारंभ है | atmachintan | Sudhanshu ji Maharah

कल्पना सृजन का प्रारंभ है

1.आपकी विचारशक्ति और कल्पना ही आपको सम्भव की ओर ले जाती हैं !
2.जैसा चिंतन , मनन करते रहोगे वही आपके सबकॉन्सियस माइंड में उतरता जाता है*!
3.सबसे अधिक सहयोग करता है अफ्फर्मेशन यानी जो विचार आपने संकल्प बना लिया उसे होता हुआ महसूस करो, विशेषकर रात्रि में सोने से पहले जो अफर्मेशन आप करके सोएंगे , वही आपके जीवन मे प्रत्यक्ष रूप में सामने आएगा !
4. इसलिए सोने से 17 मिनेट पहले का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है, उसमें अपने पॉजिटिव विचार फीड करके सो जाइये : चमत्कार घटेगा*!
5.अपने विचारों पर हर समय पहरा देना होगा ताकि कोई नकारात्मक विचार या अशुद्ध विचार हमारे मस्तिष्क में प्रवेश ना कर जाए !
6. बुरे विचार किरायेदार की तरह आते है और बाद में मालिक बनकर बैठ जाते हैं जिन्हें बाहर निकालना सम्भव नहीं ! अपने हर विचार को छानकर ही प्रवेश करने दीजिए*!
7. हमे सजग रहते हुए अपने प्रत्येक क्षण का आनंद लेना है!
8. पॉजिटिव ओर प्रसन्नता वाले विचारों को ही अपने जीवन का अंश बनाएं ! इसमें सदगुरु की बहुत बड़ी भूमिका होती है : वह हमें पग पग पर संभालते हैं और प्रगति के पथ पर लेकर जाते हैं*!!

अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा-सद्भावना के विशेष दिन-पितर पक्ष

अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा-सद्भावना के विशेष दिन-पितर पक्ष
भारतीय संस्कृति में पितर, पुनर्जन्म जैसे शब्दों की विशेष महिमा है। वर्ष में 15 दिन मात्र पितरों के प्रति श्रद्धा-समर्पण के लिए निर्धारित हैं। यही नहीं शास्त्रीय पद्धति में पितरों के लिए पृथ्वी की तरह निवास हेतु एक लोक होने की भी मान्यता है। जहां हमारे पूर्वजों की आत्मायें निवास करती हैं और पृथ्वी वासियों की श्रद्धा अनुसार उनकी मदद करती हैं। ऐसी मान्यता है
अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितरों के श्राद्ध व तर्पण का विधान है। श्राद्ध पक्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा से प्रारम्भ हो पूरे 16 दिन आश्विन की अमावस तक रहता है। इन 16 दिनों तक पितरों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण इत्यादि किए जाते हैं। यम ने नचिकेता से मृतकों पर भ्रम दूर करते हुए बताया था कि मृत्यु के उपरांत जीवात्मा किस प्रकार यमलोक, प्रोतलोक, वृक्ष, वनस्पति आदि योनियों के द्वारा भुवः लोक की यात्र करती है। ट्टग्वेद (10/16) में अग्नि से प्रार्थना की जाती है कि वह मृतकों को पितृलोक तक पहुंचाने में, वंशजों के दान पितृगणों तक पहुंचाकर मृतात्मा को तुष्ट करने व उन्हें भटकने से रक्षा करें।
विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रें में इन्हीं जीव आत्माओं के श्राद्ध-तर्पण का विधान दिया गया है। श्राद्ध का अर्थ अपने देवों, परिवार, वंश परम्परा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना भी है। उन्हें सुदृढ़ रखना भी है।

पितरों की दुनियांः
‘‘पालवन्ति रक्षन्ति वा ते पितरः’’ अर्थात् पितर आत्मायें पालन-पोषण और रक्षण करने वाली होती हैं। गोपथ ब्रह्मण में है कि ‘‘देवा वा ऐते पितरः, स्विष्ठकृतो वै पितरः’’ पालन-पोषण करने वाले और हित सम्पादन करने वाले पितर कहलाते हैं। यजुर्वेद का मंत्र जिसमें पितरों की प्रार्थना हैµ
अत्र पितरो मादमध्वं यथा भागया वृषायथवम्। अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृथायिषत्।।
अर्थात् हे पितरों! आप लोगों का आना हमारे सौभाग्य का सूचक है। आप हमारे गृह में आओ और वास करो हम आपके प्रिय पदार्थों को यथायोग्य, यथा सामर्थ्य सत्कार रूप में प्रस्तुत करते हैं, आप प्रसन्न होइये और हमारे जीवन का मार्ग प्रशस्त कीजिए, ताकि हम सुखी, शांत और आनंदित रहें।
हिंदू शास्त्रें में कहा गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, चाहे वे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प दान, पुण्य, ब्रह्मचारियों, वृद्धों, जरूरतमंद एवं पशु-पक्षी सेवा, गौ सेवा आदि की और तर्पण विधान किया जाता है, वही श्राद्ध है। माना जाता है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं। पितृपक्ष में हम जो भी धन, अन्न, वस्त्र आदि का अंश पितरों के नाम सेनिकालते हैं, उसे से सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं।

आत्माविज्ञानी बताते हैं कि मृत जीवात्मा का पारस्परिक सम्पर्क-आदान-प्रदान धरती के लोगों से वैसा ही रहता है जैसे पूर्व में था। सूक्ष्म शरीरधारी प्रत्येक जीवात्मायें अपने परिवारीजनों से सहज सम्पर्क साधना चाहती हैं। अपनी उपस्थिति का अहसास दिलाने के लिए वे अनेक उपाय अपनाती हैं और अपने प्रियजनों के साथ स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग देना चाहते हैं ऐसी मान्यता है।
यही नहीं शास्त्रें में कहा गया है कि जन्म- मरण के चक्र के तहत प्रत्येक जीव स्वर्ग-नरक, प्रेत-पिशाच, पितर, कृमि-कीटक एवं मनुष्य योनि प्राप्त करता है। छान्दोग्योपनिषद में हर जीवात्मा की विभिन्न स्थितियों का वर्णन है। गीता कहती है व्यक्ति अपने जीवन यज्ञ को करते हुए सकाम भाव होने से उसकी जीवात्मा स्वर्ग लोक जाती है और वहां विविध भोगों को पुण्यकर्म समाप्त होने तक भोगने के बाद पुनः इस मृत्युलोक में जन्म लेती है।
अखण्ड ज्योति पत्रिका में वर्णन है कि पितर ऐसी उच्च आत्मायें हैं, जो मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बनकर गुजारती हैं और अपने स्वभाव संस्कार के तहत दूसरों की यथासम्भव सहायता करती रहती हैं। इनमें मनुष्यों की अपेक्षा शक्ति अधिक होती है। सूक्ष्म जगत् से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियां भी अधिक होती हैं। उनके पास भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाइयों को दूर करने का भी प्रयत्न करती हैं। ऐसी दिव्य आत्माएं, अर्थात् पितर सदाशयी, सद्भाव-सम्पन्न और सहानुभूतिपूर्ण होती हैं। वे कुमार्गगामिता से असंतुष्ट होती तथा सन्मार्ग पर चलने वालों पर प्रसन्न रहती हैं।
श्राद्ध पक्ष में पिण्डदान और श्राद्ध कर्म के साथ दान, सेवा, उनके निमित्त गुरुकार्यों, गौ सेवा में धन आदि लगाने का महत्व भी यही है कि इनसे स्वजनों की जुड़ी भावनायें पितरों को स्पर्श करें। योगवासिष्ठ बढ़ती हैंकि मृत्यु के उपरान्त प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बन्धु-बान्धवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर तृप्त हुआ अनुभव करते हैं.
आदौ मृता वयमिति बुध्यन्ते तदनुक्रमात्। बंधु पिण्डादिदानेन प्रोत्पन्ना इति वेदिनः।।
हम पितरों के प्रति श्राद्धपक्ष में अपनी श्रद्धा व्यक्त करके उनका आशीर्वाद लेते हैं। पितर पक्ष अपने पूर्वजों के सम्मान के लिए महत्वपूर्ण अवसर होता है।

श्री गणेश विसर्जन का महत्व | vishwa jagriti Mission

Importance of shri-ganesh-immersion

यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्। इष्टकाम समृद्धयर्थं पुनरागमनाय च।।

अर्थात् हे देवगण! हमारी पूजा को स्वीकार करके आप स्वस्थान को पधारें, लेकिन पुनः हम अपनीइष्टपूर्ति हेतु आपका आवाहन करेंगे। यही है देवताओं के प्रति सही श्रद्धा-सम्मान, जो अनन्तकाल सेभावनाशील, पवित्र, समर्पित भक्तों को सुख-शांति, समृद्धि से भरता आया है। देवताओं का नमनपूर्वकआह्नान, सम्मान और सम्वेदनात्मक विदाई हमारी सांस्कृतिक ट्टषि परम्परा है। यही कारण है कि पूजाविधि में देवता का आवाहन, पूजन और पूजा समाप्ति के पश्चात उनका विसर्जन भी करते हैं।खासबात यह है कि जिस तत्व से सम्बन्धित देवता उसी तत्व में उसका विसर्जन-विलय भी जरूरी है। चूंकि गणेश जी जलतत्व के अधिपति हैं, अतः गणपति को जल में विसर्जित करने कीश्रेष्ठ परम्परा चली आ रही है। आइये! गणपति विसर्जन कर उनसे विघ्न-बाधाओं को दूर करने,मनोरथपूर्ण करने की प्रार्थना करें, साथ ही आगामी वर्ष पुनः पधारने का निवेदन भी, जिससे जीवनसौभाग्य के द्वार खुल सकें। इसलिए विसर्जन के समय यह कहा भी जाता है ‘‘गणपति बप्पा मोरियाअगले बरष तु जल्दी आ।’’

सद्गुरु साधक हैं युक्ति, भुक्ति और मुक्ति के | vishwa Jagriti Mission

सद्गुरु साधक हैं युक्ति, भुक्ति और मुक्ति केसद्गुरु साधक हैं युक्ति, भुक्ति और मुक्ति के। शब्द तीन हैं युक्ति, भुक्ति और मुक्ति, किन्तु इनमें मानव जीवन का उद्देश्य, संसार में जीवन और मोक्ष के रहस्य छिपे हुए हैं अर्थात् ये तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। यहां साधक से अभिप्राय साधना करने वाला नहीं है, अपितु इसका अर्थ है कि केवल सद्गुरु ही हैं ऐसे साधन जो हमें लोक में सुख से जीने और परलोक प्राप्त करने के तरीके बताते हैं। शिष्य का समूचा जीवन सिमट जाता है इन तीनों में। पहला ही शब्द हमारे इस जीवन के सभी पक्षों को अपने अन्दर समेटे हुए है, तीसरे शब्द मुक्ति के रहस्यों को भी गुरुदेव बतलाते ही हैं। मैं यहां जीवन के केवल संकट पक्ष की चर्चा करूंगा।
जीवन के संकट पक्ष से मेरा अभिप्राय है जब स्थितियां मनुष्य की समय और पकड़ से बाहर हो जायें, बुद्धि काम न करे, हर समय मस्तिष्क सोच में उलझन में कोई काम करे, तो जो सोचा, परिणाम उसके विपरीत, तब सब साथ छोड़ जाते हैं, घर वाले भी, जिन के लिये आप जीवन भर सब कुछ करते रहे, वे भी ताने देते हैं, सकपकाते हैं और व्यक्ति सब ओर से हारकर निराशा में, अवसाद में, डिप्रेशन में चला जाता है। ऐसी स्थिति को संकट की स्थिति कहते हैं और तब सद्गुरु सम्भालते हैं, जीवन दान देते हैं।, विश्वास जगाते हैं, हौंसला देते हैं और अपने आशीष का हाथ शिष्य के सिर पर रखकर उसे मृत्यु अर्थात् आत्म हत्या के द्वार से वापिस ले आते हैं। इससे बड़ा उपकार क्या होगा? दो उदाहरण इसे स्पष्ट करते हैं।
उदाहरण देने से पूर्व, वर्तमान समय में गुरुदेव जी ने दो कृपाएं की हैं, कर रहे हैं  कोरोना काल में। कृपाएं तो उनकी सब पर अनेक हैं, किन्तु मार्च 2020 के मध्य से आनन्दधाम की पावन माटी से, गुरुधाम रुपी तीर्थ से, सात्विक ज्ञान की भगीरथी प्रवाहित कर दी गुरुदेव जी ने। सम्पूर्ण विश्व में शिष्यों का जीवन जैसे धन्य हो गया, ज्ञान का ज्ञान और लाईव गुरु दर्शन। आतंक, भय और निराशा काल में वैदिक ज्ञान, गीता ज्ञान, गुरुगीता ज्ञान, ध्यान साधना, मन्त्र सिद्धि साधना, मृत संजीवनी साधना से शिष्यों के जीवन को धन्य कर दिया।

गुरुदर्शन हो गये, गुरुपूजन हो गया, गुरुज्ञान मिल गया और सिद्ध सफल हो गई गुरुपूर्णिमा चांद भी मिल गया, चान्दनी भी मिल गई स्नाान भी हो गया, ज्ञान गंगा में और गुरुदर्शन का पुण्य भी अर्जित कर लिया। यह है आनन्द कृपा से गुरुकृपा की प्राप्ति।
पहला उदाहरण एक तमिल विद्यार्थी का है। स्कूली शिक्षा में श्रेष्ठतम, विज्ञान में शत-प्रतिशत अंक हर कक्षा में, आई- आई- टी मद्रास से इंजीनियरिंग में प्रथम, कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय से एमबीए किया, अमेरिका में अच्छी सर्विस मिल गई, एक सुन्दर शिक्षित तमिल कन्या से विवाह हो गया, पांच कक्षों वाला विशाल मकान खरीद लिया, दो बच्चे हो गये, सुखद, हंसता-खेलता मुस्कुराता चहचहाता जीवन, दो महीने पूर्व परिवार सहित आत्महत्या कर ली।  कैलीफोर्निया इन्टीट्यूट ऑफ किनीकल साईकालोनी से इस पर शोध किया और निष्कर्ष निकाला कि वह संकट की स्थितियों से घबरा गया, कोरोना में उसकी नौकरी छूट गई, मकान की किश्त नहीं दे पाया, घर चलाना मुश्किल हो गया और घबराहट में पूरा परिवार समाप्त कर लिया।

इस दुर्घटना की तरह मुम्बई के सफल कलाकार सुशान्त राजपूत की सच्ची तात्कालिक घटना है, उसने भी विपरीत परिस्थितियों में विषाद में आत्महत्या कर ली। अत्यन्त योग्य सफल विद्यार्थी, मुस्कराते स्वभाव वाला सफल एक्टर, कई कारणों से फिल्म उद्योग में स्थितियां उसके विपरीत कर दी गईं या हो गईं, कारणों की छानबीन हो रही है।
गुरुदेव सर्वदा सुरक्षा कवच बनकर साथ खड़े रहे। सब शिष्यों के साथ संग-संग रहते हैं गुरुदेव। इसी कारण गुरुदेव अपने प्रवचनों में भावनात्मक और संकट स्थिति वाले कोशेन्ट की चर्चा करते हैं शिष्यों की भलाई के लिये। कोरोना काल में शिष्यों को कितना बल दिया, साहस दिया, बहुत कुछ दिया, जिस का उल्लेख किया गया। शब्दकोश में कोशेन्ट का अर्थ भज फल या उपलब्धि दिया गया है।
कोशेन्ट चार प्रकार का होता है-
1- इन्टैलीजैंस कोशेन्ट – बुद्धिमता कोशेन्ट
2- इमोशनल कोशेन्ट – भावनात्मक कोशेन्ट
3- सोशल कोशेन्ट – सामाजिक कोशेन्ट
4- एडवरसटी कोशेन्ट – संकट या विपरीत काल कोशेन्ट
पहले का आपकी शैक्षणिक योग्यता से सम्बन्ध है, दूसरे का भावनाओं से जुड़ी बातों या घटनाओं से सम्बन्ध है, सोशल में आप सामाजिक जीवन में कैसे सम्बन्ध बनाते हैं और चौथे का सम्बन्ध उन स्थितियों से होता है, जो आपके जीवन में धीरे-धीरे अचानक आ गई हैं। चौथी स्थिति में बहुत सावधान, सतर्क, शान्त, धैर्यवान और सन्तुलन रखने की महती आवश्यकता होती है। विश्व में हर स्तर पर सैकड़ों हजारों उदाहरण हैं, जब बड़े-बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति भी इसके शिकार हो गये। उन उदाहरणों में जाना उचित नहीं है।

मुख्य उद्देश्य यह है कि परमपूज्य सद्गुरुदेव जी महाराज ने विश्व में सम्पूर्ण मानव जाति पर, विशेष कर अपने शिष्यों पर असंख्य उपकार किये हैं, चाहे वे लौकिक सफलताओं या विफलताओं से सम्बन्धित हों, ईश्वरीय ज्ञान से सम्बन्धित हों, शिष्यों के लोक और परलोक दोनों को सुधारा हो। गुरुवर ने इसीलिए तो प्रारम्भ में भारत देश की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को बारीकी से देखने के लिये भ्रमण किया, फिर जो स्वयं ज्ञान, ध्यान, जप, साधना, अंतर्बोध से प्राप्त किया, उसे इन चालीस बयालीस वर्षों में जनसाधारण के दुखों को कम करने और सुख देने के लिये उन्हें बांट दिया। गुरुदेव ईश्वर के अवतार हैं, ज्ञान-विज्ञान के असीमित सागर हैं, कोमल-करुण हृदय वाले महामानव हैं। ईश्वर गुरुदेव जी को स्वस्थ, सुखी, दीर्घ आयु देने की कृपा करना।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।।

गुरुकृपा एवं गौ आशीर्वाद का दोहरा लाभ पायें | sudhanshu Ji Maharaj

Get double benefit of Gurukrupa and cow blessings

 

गुरुकृपा एवं गौ आशीर्वाद का दोहरा लाभ पायें

गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः।
तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान्।।
अर्थात् जो व्यक्ति गायों की हर विधि से सेवा करता और उस पर सर्वस्व समर्पित करता है, उससे संतुष्ट होकर गौएं उसे अत्यंत दुर्लभ वर प्रदान करती हैं।
घस मुष्टिं परगवे दद्यात् संतत्सरं तु यः।
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम्।।
जो व्यक्ति एक वर्ष तक प्रतिदिन स्वयं भोजन करने से पहले गाय को एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका यह सेवा संकल्प जीवन की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करता है।
वास्तव में गाय आशीर्वाद ही नहीं देती, अपितु गौ सेवा से हमारे जीवन में एक रक्षाकवच भी बनता है, जो हर परिस्थिति में व्यक्ति के साथ रहता है। वह कष्ट-कठिनाइयों में गौसेवक का संरक्षण करता है। गौ सेवा घर-परिवार की समृद्धि को भी जगाता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात है कि यदि जिस गाय की सेवा की जा रही है वह गाय गुरु आश्रम की हो, तो उसके तीर्थ परिसर व गुरुसत्ता से जुड़ी होने के कारण गौ सेवक पर कृपा अनन्तगुना बढ़ जाती है। गुरुकुलों, गुरु आश्रमों, गुरुतीर्थों में इसीलिये अनन्त काल से गौ सेवा, गौशाला स्थापना का विधान चला आ रहा है।
भारतीय संस्कृति में गुरु, गाय, गुरुआश्रम एवं गुरु आराधना का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। युगों-युगों से साधक गुरु भक्त व शिष्य वहां आकर गौसेवा कर अपने दुख-कष्ट से छुटकारा पाते आ रहे हैं। पूज्यश्री सुधांशु जी महाराज ने इस संकल्प से ही अपने आनन्दधाम आश्रम में गौसेवा परम्परा का शुभारम्भ किया है। आश्रम में गुरुदेव स्वयं नित्य गौसवा करके भक्तों को प्रेरणा देते हैं कि देश में गौ सेवा की संस्कृति को बढ़ावा मिले। इस हेतु विश्व जागृति मिशन के अन्य आश्रमों में भी गौशाला का अभियान जोड़ रखा है।
आनन्दधाम तपोमय तीर्थ में वर्षों से देश-विदेश के हजारों साधक गौसेवा के लिए पधारते हैं तथा गुरु आशीर्वाद के साथ-साथ गौसेवा द्वारा जीवन में अपने पुण्य-परमार्थ जगाते हैं। सद्गुरुदेव ने तपोमय क्षेत्र आनन्दधाम की इस गौशाला को कामधेनु नाम दिया है, यह है भी उसी तरह, क्योंकि यहां गौसेवा करने वाला खालीहाथ कभी नहीं जाता। कोरोना महासंकट मिटने के बाद जब कभी आप आनन्दधाम आश्रम पधारें, तो यहां गौसेवा से जुड़ें, अपने हाथों गायों को चारा खिलायें तथा गुरु कृपा, गौ आशीर्वाद से अपने परिवार का सुख-शांति, समृद्धि, आनन्द, सौभाग्य जगायें।

गौ-सेवा से आती है सुख, शांति और समृद्धि | Sudhanshu ji maharaj | vishwa jagriti Mission

Happiness, peace and prosperity comes from cow-service

भारत में गौ सेवा, गौदान, गौ संवर्धन के लिए दान एवं गुरुकार्यों को बढ़ाने के लिए दान की अनन्त कालीन परम्परायें चली आ रही हैं। साथ ही सावधान भी किया गया है कि दान सद्पात्र को ही देना चाहिए। सद्पात्र का आशय जहां गुरु का संरक्षण हो, गौशाला में गायों की सेवा होती हो, गुरुकुल एवं वृद्धाश्रम चले रहे हों तथा स्वास्थ्य सेवा का अभियान चलता हो वह स्थान तीर्थ बन जाता है। ऐसे स्थान पर दिया गया दान अनन्त गुना होकर फलित होता है। साथ ही सत्पात्र को दिया गया दान दान देने वाले को दिन-दिन समृद्ध करता है।
इस संदर्भ में कथानक आता है कि प्राचीनकाल में ब्रह्मचारी सत्यकाम जाबाल के उपनयन-संस्कार पर उनके गुरु ने सैकड़ो दुबली-पतली गौएं सत्यकाम को सौंपते हुए बोलेµबेटा! तू इन गौओं को चराकर हृष्ट-पुष्ट करके ले आओ। कुशाग्र बुद्धि सत्यकाम गुरु के भाव को समझ गये। गुरु की आज्ञा मानकर वह जंगल में गौओं के ही बीच में रहते, उनकी सेवा-शुश्रूषा करते, वन के सभी क्लेशों को सहते। उस बालक ने अपने जीवन को गौओं के जीवन में लगा दिया। सत्यकाम गो सेवा में ऐसा तल्लीन हो गये कि पता ही न चला कि गौएं कितनी हो गयी हैं। साथ ही गौओं की इस निष्काम सेवा-शुश्रूषा से सत्यकाम परम तेजस्वी ब्रह्मज्ञानी भी होते गये।
कुछ समय बाद उसने पहले से अनेक गुनी गौओं को ले जाकर गुरु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। गुरु ने उसके मुख को देखा तो देदीप्यमान। यह देखकर अत्यन्त प्रसन्नता से बोले ‘बेटा सत्यकाम! तुम्हारे मुखमण्डल को देखकर तो मुझे ऐसा लगता है, तुझे ब्रह्मज्ञान हो गया है। पर तुझे यह ब्रह्मज्ञान का उपदेश किसने किया?’
सत्यकाम ने अत्यन्त विनीत भाव से कहा ‘गुरुदेव! आपकी कृपा और इन गायों की सेवा से क्या नहीं हो सकता है। पर जब आप मुझे अपना उपदेश करेंगे, तभी मैं अपने को पूर्ण समझूंगा।’ वास्तव में गुरु और गौ सेवा का शिष्यों के आत्म उत्थान में सदियों से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसीलिए गुरुकुल में गुरु सान्निध्य में जीवन निर्वहन एवं गौदान, गो सेवा को हमारी संस्कृति में जीवन का सौभाग्य माना गया है। गायों की सेवा व दान आदि की प्राचीन काल से इसीलिए महिमा चली आ रही है। अग्नि पुराण के अनुसार गायें परम पवित्र और मांगलिक मानी गयी हैं। गाय का गोबर और गौ मूत्र जीवन की दरिद्रता दूर करता है। उन्हें सहलाना, नहलाना, पानी पिलाना, चारा खिलाना अत्यन्त पुण्यफलदायक बताया गया है। यह उपनिषद कहता है कि गोरक्षा के लिए लगा हुआ, गौ ग्रास देने वाला व्यक्ति सद्गति प्राप्त करता है। गौ दान करने से समस्त कुल का उद्धार होता है। गौ के श्वांस से भूमि पवित्र होती है। गाय के स्पर्श से पाप नष्ट होते हैं। इसी तरह स्कन्दपुराण कहता है कि ‘ब्रह्माजी ने गौओं को दिव्य गुणों से युत्तफ़ अत्यन्त
मंगलकारिणी बनाया है। अतः सदैव उनकी परिक्रमा और वन्दना करनी चाहिए। गौओं के गौ मूत्र, गोबर, दूध, दही, घीµये पांचों वस्तुएं पवित्र मानी गई हैं और ये सम्पूर्ण जगत को पवित्र करने वाली हैं।’
मारर्कन्डेयपुराण तो गाय को साक्षात् वेद ही कहता है। इसके अनुसार विश्व का कल्याण गाय पर आधारित है। गाय की पीठ-ट्टग्वेद, धड़µयर्जुवेद, मुखµसामवेद, ग्रीवाµइष्टापूर्ति सत्कर्म, रोमµसाधु सूत्तफ़ है। उसके मल मूत्र में शांति और पुष्टि समाई है। इसलिए जहां गाय रहती हैं, वहां के लोगों के पुण्य कभी क्षीण नहीं होते। गौ भक्त को गाय पुण्यमय जीवन को धारण कराती है। गौ उत्थान को इसीलिए सभी संतों-ट्टषियों ने प्रोत्साहित किया है।
कहते हैं गौसेवा, गौसंवर्धन के विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए दान अवश्य देना चाहिये। गोदान हो अथवा अन्न आदि का दान सद्पात्र के हाथ दिया जाता है, तो वह दाता को सुख, शांति, समृद्धि, आनंद, ईश्वर कृपा से भर देता है।
जिस प्रकार से अपने हाथ से भूमि में निवेश किया गया धन, मनुष्य की आवश्यकतानुसार जब चाहे काम में आ सकता है, उसी प्रकार अपने हाथ से किया गया गौसेवा के लिए दान भी प्रत्यक्ष फलदायी है। इसीलिए हमारेदेश की संस्कृति परम्पराओं में गौदान की परम्परा भी महत्व रखती है। सच कहें तो गौ की सेवा और उनके अमृततुल्य दूध और उनके अन्य सभी उत्पाद से हमें लौकिक और पारलौकिक सुख की प्राप्ति होती है। अतः हम-आप भी गुरुधाम की गौशाला में गौ सेवा के लिए अपना धन लगायें, जीवन में गुरुकृपा, सुख-सौभाग्य पायें।

माता-पिता, बुजुर्गों के प्रति सम्मान सांस्कृतिक तप | Sudhanshu ji Maharaj

Respect for parents, elders, cultural tenacity

भारतीय ट्टषि प्रणीत इस संस्कृति पर पिछली कुछ शताब्दियों में अनेक आघात हुए। आक्रमण केवल राजनीतिक एवं सैन्य ही नहीं थे, अपितु इन हमलों ने देश की संस्कृति, जीवन मूल्य, संस्कार, जीवन शैली सबको छिन्न-भिन्न कर दिया है। परिणामतः अन्य सामाजिक मूल्यों के साथ-साथ, समाज के अपने वृद्धजनों, माता-पिता व अग्रजों के प्रति दृष्टिकोण में भारी अंतर आया। रही-सही कसर 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उपजी उपभोगवादी विचारधारा ने पूरी कर दी। इसने तो संयुक्त परिवारों के विघटन को जन्म दिया और भारत के बड़े-बूढ़ों के सामने समस्याएं उत्पन्न हुईर्ं। वे उपेक्षा, अकेलेपन व असुरक्षा के शिकार हुए। उन बुजुर्गों की संताने, अर्थात् नई पीढ़ी भी परिस्थिति बस यह सब होते देखती भर रह गयी। क्योंकि उसके सामने जीवन की आर्थिकी का भयावह प्रश्न जो खड़ा था। इससे परिवार टूटे, वे संस्कार टूटे जिनके सहारे नई पीढ़ी को मातृदेवो-पितृदेवो भव का संदेश मिलता था। दुःखद पहलू यह कि घर छूटा और एक तरफ नई पीढ़ी अपने आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए भटकने लगी। दूसरी ओर अनुभव समेटे वृद्धगण बेसहारा और लाचार जीवन जीने लगे। दोनों पीढ़ियां आज एक दूसरे के आमने-सामने जो प्रतिद्वन्द्वी बनकर खड़ी हैं, उसमें सांस्कृतिक क्षरण एवं आर्थिक अतिमहत्वाकांक्षा प्रमुख कारण है।
सम्बन्धों का महत्व समझेंः
यही नहीं वृद्धगणों को प्राकृतिक एवं स्वाभाविक रूप से अनेक शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं के शिकार होते देख भी अपनी महात्वाकांक्षावस युवा-पीढ़ी उनसे कतराने लगी। युवावर्ग उपयोगिता की दृष्टि से माता-पिता के प्रति देखने लगा, तो बुजुर्ग पीढ़ी युवावर्ग पर स्वार्थी, संस्कार हीन होने का आरोप लगाने लगी। हमें दोनों पीढ़ियों को एक धुरी पर लाकर भारत भूमि को इस दंश से उबारना होगा। इसके लिए प्राचीन ट्टषि परम्परा को पुनः आत्मसात करना होगा।
भारत की संस्कृति एवं चिन्तन शैली में मातृ देवो भव, पितृ देवो भव अर्थात् माता-पिता देव स्वरूप माने गये हैं, मानवीय सम्बन्धों के इस पक्ष का हमारे पवित्र ग्रन्थों में विस्तृत उल्लेख है। शास्त्रें में माता-पिता, गुरु व बढ़े भाई को कर्म या वाणी द्वारा अपमानित न करने का स्पष्ट संदेश दिया गया है।
आचार्येश्च पिता चैव, माता भ्रात च पूर्वजः। नर्तिनाप्यवमन्तव्या, ब्राह्मणेन न विशेषतः।।
कहते हैं ‘‘आचार्य, माता-पिता, सहोदर बड़े भाई का अपमान दुःखित होकर भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि आचार्य परमात्मा की, पिता प्रजापति की, माता पृथ्वी की और बड़ा भाई अपनी स्वमूर्त्ति होता है।’’ हमें परस्पर सम्बन्धों के महत्व बताने होंगे।
सलाह लें, सम्मान देंः
यही नहीं भारत में अनन्तकाल से कोई भी निर्णय करने से पूर्व वृद्धों-बुजुर्गों से परामर्श लेने की परम्परा चली आ रही है। पर बुजुर्गों के चरण छूना, उनसे बातें करना, उनके सुख-दुःख की जानकारी रखना, कठिनाईयों के निराकरण में उनसे परामर्श लेना, उनकी शारीरिक-भावनात्मक व मन अनुकूल आवश्यकताओं का ध्यान रखना, उनकी छोटी-सी भी आज्ञा का जहां तक संभव हो पालन करना, उनसे आशीर्वाद लेने के अवसर खोजना आदि हमारी संस्कृति के मूल्य रहे हैं। यह कटु सच है कि ‘‘संतान उत्पन्न होने, गर्भधारण, प्रसव वेदना, पालन, संस्कार देने, अध्ययन-शिक्षण आदि के समय माता-पिता घोर कष्ट सहते हैं, अपने को निचोड़ देते हैं। जिसका सैकड़ों व अनेक जन्मों में भी बदला नहीं चुकाया जा सकता है। यह बात नई पीढ़ी को गहराई से सोचना होगा।
अवमानना से बचेंः
सच में मानवीय व्यवहार, शिष्टाचार तक से अपनी ही संतान द्वारा अपने माता-पिता व परिवारिक बंधु-बांधवों को उपेक्षित होना पड़े तो अस“य पीड़ा होना स्वाभाविक है। अतः अपने मूल्यवान शिष्टाचार निर्वहन की हर युवा से पुनः अपेक्षा है। यदि जिनके सान्निध्य में हम रहे हैं, उनकी ही अवमानना होगी तो न तो नई पीढ़ी को सुख मिलेगा, न शांति। ऐसे में समाज व राष्ट्र निर्माण की कामना भी व्यर्थ साबित होगी। कहा भी गया है कि सैद्धान्तिक रूप से मतभेद के बावजूद नई पीढ़ी द्वारा बड़ों को सम्मान देने का उच्च आदर्श निर्वहन करना ही चाहिए। क्योंकि इससे युवाओं का हित है, साथ नई पीढ़ी जो आने वाली है उसे भी सही दिशा मिलेगी। हमारे यहां माता-पिता और गुरु तीनों की शुश्रुषा को श्रेष्ठ तप कहा गया है। माता-पिता और गुरु भूः, भुवः, स्वः तीन लोक व ट्टग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद कहे गये हैं। इनके सम्मान करने से तेज बढ़ता है। महर्षियों, संतों ने जगह-जगह माता-पिता और गुरु की सेवा के श्रेष्ठ फल का बखान करते हुए कहा कि ‘‘जो व्यक्ति व गृहस्थ एवं बुजुर्ग तीनों का आदर, सम्मान व सेवा करके उन्हें प्रसन्न करता है, वह तीनों लोकों का विजेता बनता है और सूर्यादि देवताओं के समान तेजस्वी, कीर्तिवान बनता है। शास्त्र कहते हैं व्यक्ति अपनी माता की भक्ति व सेवा से मृत्युलोक को, पिता की भक्ति से अन्तरिक्ष लोक और गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक को जीतता है।
आचार-शिष्टाचार अपनायेंः
भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों का सम्मान इतना कूट-कूट कर भरा था कि उसी प्रेरणा से मृत माता, पिता या पितरों के लिए भी श्राद्ध किये जाते हैं। ऐसे में जीवित माता पितादि पालक वृद्धजनों की प्रसन्नता के लिए प्रतिदिन उन्हें आवश्यक अन्न, जल, दूध, दवा अथवा अन्य जीवनोपयोगी व्यवस्थाओं से उन्हें क्यों मरहूम किया जाना, समझ से परे है।
पूज्यश्री सुधांशु जी महाराज कहते हैं माता-पिता को देवतुल्य मान कर उनकी सेवा व सुश्रुषा करना संतान का कर्तव्य है। यदि प्राचीन संस्कृति को पुनर्जागृत करना चाहते हैं, तो हमें इन जीवन आचार व शिष्टाचार के मूल्यों को अपने परिवार के बीच स्थापित करना ही होगा। वैसे भी सन्तान का किसी विशेष परिवार में जन्म लेना किसी प्रयास का परिणाम नहीं है, अपितु मनुष्य के सुकर्म का प्रभाव है। पूर्व निर्धारित है, इसलिए भी उनके प्रति उचित शिष्टाचार निर्वहन हर नई पीढ़ी के लिए जरूरी है।’’ वैसे भारतीय संस्कृति अनन्तकाल से परोपकार, त्याग, आज्ञाकारिता, एक दूसरे पर निर्भरता पर आधारित है। इन्हीं संस्कारों में परिवारों के वृद्धजनों की जीवनपर्यन्त देखभाल करने की परम्परा भी है। परिवारीजनों का सहज सहयोगी व्यवहार वृद्धावस्था में वृद्धजनों को अपनत्व की ताकत देता है। इस भावनात्मक आदान-प्रदान के कारण उन्हें एकाकीपन की पीड़ा नहीं सहनी पड़ती। सम्बन्धों की दृष्टि से दादा-दादी, नाना-नानी के रूप में जो विशेष भूमिकायें बनाई गयी हैं, उसके पीछे भी सेवा, सहायता, सम्मान का जीवनभर रिश्ता कायम रखना ही उद्देश्य है। इससे व्यक्तिगत जीवन व परिवार दोनों सुखमय बनते हैं। आज पुनः जरूरत है कि भारतीय संस्कृति को पुनर्जागृत करके हम सब देश में परिवारों को सुखमय व आनंदपूर्ण बनायें। इस अभियान से संस्कृति की शक्ति बढ़ेगी। परिवारों में परस्पर देवत्व जागृत होगा। यही नई पी़ी का सांस्कृतिक तप है।

आइये! जवानी में ही बुढ़ापे को रोकने की करें तैयारी | Sudhanshu Ji Maharaj | VJM

Come! Prepare to stop old age in youth

आइये! जवानी में ही बुढ़ापे को रोकने की करें तैयारी मनुष्य की चिंतनशैली असंतुलित-अशांत रहने पर उसके प्राणों की गति भी असंतुलित होती है, जिसका दण्ड सम्पूर्ण शरीर को रोग के रूप में भुगतना पड़ता है। पर इसका प्रभाव सबसे पहले उसके पाचन तंत्र पर पड़ता है। क्योंकि व्यक्ति द्वारा खाया हुआ अन्न अच्छी तरह पचता नहीं अथवा कभी-कभी पाचक तंत्र अधिक तीब्र हो जाता है और जठराग्नि बन जाती है। परिणामतः प्राणों के सूक्ष्मतम प्रवाह के साथ बिना पचे अन्न के परमाणु स्तर के कण भी घुलकर प्राणों तक जा पहुंचते हैं और वहां जमा होकर सड़ने लगते हैं, जो अंत में मानसिक रोग-‘आधि’ उत्पन्न करते हैं। इन्हीं आधियों से शारीरिक रोग-‘व्याधि’ उत्पन्न होते हैं। जानकारी के अभाव में व्यक्ति इन्हें ठीक करने के लिए बाहरी औषधियों का सहारा लेता है, जो कारगर साबित नहीं होते क्योंकि रोग तो उसकी मनोदशा में उपजे बिकारों का परिणाम होते हैं। इसके चलते व्यक्ति में बुढ़ापा जल्दी आ धमकता है। मनोविकार हमें बुजुर्ग न बनायें इसलिए कम उम्र में होने वाले रोगों के पीछे के कारणों को ध्यान देने की बात शरीर विज्ञानियों द्वारा कही जाती है।

विशेष शोधाः
उन दिनों के प्रसिद्ध मनोविश्लेषक डॉ- कैनन ने अमेरिका के पेट रोगियों में पाया कि ‘‘पेट रोग के अधिकांश व्यक्ति दूषित विचारों एवं मनः स्थिति वाले पाये गये। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यदि व्यक्ति मानसिक चिन्ताओं, दूषित विचारों एवं आवेगों से पीड़ित होगा, तो उसके पेट की क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ना सुनिश्चित है और बूढ़ा व्यक्ति तो सदैव पेट का रोगी बना रह सकता है।’’ ऐसे में सामान्य स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए मनुष्य को सत्संग, गुरुदर्शन, नामस्मरण, जप द्वारा सकारात्मक एवं पवित्र विचारों का बना रहना अत्यावश्यक है। बुजुर्गावस्था में मन की थोड़ी विकृत अवस्था से परिणाम का नकारात्मक आना सुनिश्चित है। बुजुर्गों में तो सामान्य रूप से लगातार थकावट अनुभव होती रहती है। सामान्यतः लोगों का मानना है कि थकान का कारण अत्यधिक शारीरिक श्रम करना है। लेकिन शरीर विशेषज्ञों के अनुसंधान बताता है कि ‘‘थकावट का कारण शारीरिक परिश्रम नहीं, अपितु कार्य के दौरान विषम मनःस्थिति का होना प्रमुख कारण है।’’ इसी के साथ ‘‘उतावलापन, घबराहट, चिन्ता, हताशा-निराशा, अतिभावुकता, वैचारिक उलझनें आदि जीवन में थकान उत्पन्न करते हैं।’’ ऐसी स्थिति में व्यत्तिफ़ द्वारा दो कदम चलना भी भारी हो जाता है।

ऐसा भी होता हैः
कभी-कभी भावनात्मक एवं मानसिक टूटन के कारण हुए अपच से सिर दर्द, चक्कर, मूत्रशय में सूजन जैसी बीमारियां, गले के दर्द, गर्दन दर्द, पेट एवं वायु विकार सम्बन्धी रोग से बुजुर्ग पीड़ित होने लगते हैं। डॉ- केन्स डेलमार जैसे अनेक विशेषज्ञों द्वारा शरीर और मन के सम्बन्धों को लेकर किये शोध कार्य का निष्कर्ष रहा कि ‘‘शरीर में कोई रोग उत्पन्न नहीं हो सकता, जब तक कि मनुष्य का मन स्वस्थ है।’’ उन्होंने मनःस्थिति और रोगों के बीच सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए बताया था कि जैसे ‘‘गठिया’’ का मूल कारण ईर्ष्या है। इसीप्रकार जो व्यक्ति निराश-हताशा में जीते हैं तथा सदैव दूसरों का छिद्रान्वेषण करते हैं, दोषारोपण के आदी होते हैं, वे कैंसर जैसे घातक रोग के शिकार होते हैं। इसी प्रकार कुछ लोग सदैव कांपते, ठंड से सिकुड़ते देखे जाते हैं उनके प्रति डॉ- केन्स डेलमार की मान्यता थी कि अनावश्यक ठंडी लगती ही उन लोगों को है, जो दूसरो को सदैव परेशान करने में अधिक रुचि लेते हैं।

रोग के अन्य कारणः
उन्होंने ‘‘स्नायुशूल’’ पर निष्कर्ष दिया कि इसके रोगी व्यावहारिक जीवन में आवश्यकता से अधिक स्वार्थी, खुदगर्ज तथा हिंसक होते हैं। इसी क्रम में हिस्टीरिया और गुल्म जैसे रोगों के शिकार भी किसी न किसी दुष्प्रवृत्ति के शिकार होते हैं। उन्होंने आगे बताया चोर, ठग-दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति को हताशा-निराशा घेरती है, अजीर्ण, झगड़ालू लोगों को होता है। तात्पर्य यह कि हर बीमारी मनुष्य की मानसिक विकृति का परिणाम है। आज संसार में रोग-शोक की बाढ़ है, उसका कारण विकृति और बुरे विचारों का व्यक्ति के मन के अंदर गहरी पैठ होना है। यदि मनुष्य अपनी मनःस्थिति को ऊर्ध्वगामी बना सके, तो अक्षय आरोग्यता का वह स्वामी बन सकता है। जीवन को मनचाही दिशा में नियोजित कर सकना, हंसी-खुशी का लाभ उठाना उसकी सहज जीवनरीति बन सकती है। सद्गुरु पूज्य श्री सुधांशुजी महाराज का अपने शिष्यों पर सोने-जागने, आहार ग्रहण करने के तरीके सहित विविध अवसरों पर सदैव सकारात्मक सोच एवं सद्विचारों को अपनाये रखने के निर्देश के पीछे ये तथ्य ही प्रमुख कारण हैं। अतः जरूरत है हम सब गुरु चिंतन, गुरु प्रेरणा को जीवन का अंग बनाकर शरीर, मन एवं भावना को रोग-शोक से मुक्त रखें और बुढ़ापे को आने से पहले ही रोक लें।