अपना शुद्ध मन ही सबसे बड़ा तीर्थ है- कर्म, ज्ञान और भक्ति ही त्रिवेणी (संगम) है

A pure mind is the greatest pilgrimage

मन ही मनुष्य के बंधन और मुक्ति का कारण है। मन से मान लिया जाये तो दुख और यदि मन से किसी भी प्रकार के दुख को निकाल दिया जाये तो सुख ही सुख है। यदि आप मन को एकाग्र कर शांति का अनुभव करें तो आपका निर्मल मन आपको चिरशान्ति प्रदान करेगा और आपको लगेगा कि दुनिया की सबसे बड़ी दौलत आपको मिल गई, जिस सम्पत्ति को हम दुनिया में खोज रहे थे, वह हमें अपने अंदर ही मिल गई। चैन, सुकून, शांति बाहर नहीं वह तो हमारे अंदर ही थी लेकिन हम मृगतृष्णा में भटक कर उसे बाहर खोज रहे थे। मन के शांत होने से अब आनंद ही आनंद है। अब समस्त सुखों का संगम हमारे मन में ही हो गया है और हमारा शुद्ध व शांत मन ही सबसे बड़ा तीर्थ है। ज्ञान-कर्म और भक्ति का परस्पर सम्बन्ध है। इसलिये मानव जीवन में तीनों का सामंजस्य अवश्य होना चाहिये। यदि व्यक्ति कर्म-ज्ञान और भक्ति का संतुलन बनाए रखे तो उसका जीवन व्यवस्थित हो जाता है।

ज्ञान आंख है, कर्म पांव है। आंख से देखो और पांव से चलो, बिना देखे चलना कुएं में गिरना है। सिर्फ चलना ही बाकी रहे, देखा न जाए तो वह चलना व्यक्ति को चोट पहुंचाएगा और अगर चलें नहीं केवल देखते ही रहें तो फिर उस देखने का भी कोई लाभ नहीं। इसलिये दोनों का तालमेल बनाकर आत्मा की यात्र को परमात्मा तक अर्थात् मंजिल तक पहुंचाया जा सकता है और परमात्मा रूपी मंजिल को प्राप्त कर लेना ही भक्ति है।

शरीर में ज्ञानेन्द्रियां और कर्मेन्द्रियां दोनों है -ज्ञानेन्द्रियों से ज्ञान प्राप्त होता है और कर्मेन्द्रियों से कर्म। दोनों का होना ही जीवन है। ज्ञान भी चाहिये और कर्म भी चाहिये। पक्षी के दो पंख है। एक पंख से उड़ा नहीं जा सकता। किसी रथ का एक पहिया हो तो रथ चल नहीं सकता। ऐसे ही ज्ञान के बिना कर्म नहीं हो सकता और कर्म के बिना व्यक्ति ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकता। ज्ञान और कर्म के बिना व्यक्ति एक क्षण भी नहीं रह सकता है ‘न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’ कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिये भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। प्रकृति ने हमें बनाया ही ऐसा है कि हम हर समय कर्मशील रहें कर्म के बिना कहीं ठहरा नहीं जा सकता। कर्म हमारे स्वभाव में उतर आए और गुरु से ज्ञान प्राप्त कर हम भक्ति के मार्ग पर चलते हुए ईश्वर की प्राप्ति कर लें तो समझना चाहिये जीवन सार्थक हो गया।व्यक्ति कितना भी खाली बैठे तो भी वह खाली नहीं बैठ सकता। कुछ-न-कुछ जरूर करेगा। बच्चों के अन्दर आप देखते हैं-उनका रोम-रोम कर्म से जुड़ा हुआ होता है, वे कहीं चैन से नहीं बैठ सकते-वे हिलेंगे, डुलेंगे, चलेंगे। अगर व्यक्ति चुपाचाप बैठा रहे तो मन चलता रहेगा और मन भी न जाने कहां तक लेकर जाता है। एक क्षण भी हम खाली नहीं बैठ सकते।

कर्म तो जीवन के साथ है। रुकना नहीं है, चलते रहना है। तैत्तिरेय ब्राह्मण का उपदेश हैµ‘‘चरन् वै मधु विन्दते’’ जो चला है, उसी ने जीवन का माधुर्य प्राप्त किया है। ‘‘चरन् स्वादुमुदम्बरम्’’ चलने वालों ने ही जीवन का मीठा, स्वादिष्ठ फल पाया है। सूर्य गतिमान है। संसार को प्रकाशित करता है। चन्द्रमा की शीतलता से संसार रसपूर्ण है। यहां सूर्य गतिशीलता कर्म और प्रकाश का प्रतीक है वहीं चन्द्रमा मन का परिचायक है जो हमेशा घटता-बढ़ता रहता है लेकिन सदा चलायमान है। सतत् प्रकाशित एवं रसपूर्ण होने के लिये चरैवेति-चरैवेति सूत्र को जीवन में उतरना होगा। चलते रहो, कर्म करते रहो, रुको नहीं।

प्रकृति का नियम है कि हर कोई गतिमान है। चीटियों को देखिए। छोटी-सी चींटी अन्धेरे में भी दौड़ी जा रही है। अचानक आप लाईट जलाते हैं देखकर आश्चर्य होता है कि अन्धेरे में भी चींटियां दौड़ी जा रही हैं। रात काफी हो चुकी है, पर उन्हें सोने नहीं जाना। शरीर से ज्यादा सामान उठाकर जा रही होती हैं। उनका ‘वन-वे टैªफिक’ चलता है। एक तरफ जाने का रास्ता है तो दूसरी तरफ आने की व्यवस्था कर रखी है। कहीं दोनों तरफ का मार्ग ‘टू वे टैªफिक’ भी चलता है। चीटियां बहुत तेजी से भागे जा रही हैं। लेकिन एक्सीडेंट बिल्कुल नहीं होता। बीच-बीच में प्रहरी खड़े हुए हैं, वे व्यवस्था देख रहे हैं। जो निरीक्षण कर रहे हैं, वे देख रहे हैं कि व्यक्ति के पास यदि सामान ज्यादा है तो दौड़कर जाएंगे उसका साथ देंगे। छोटे से जीवन को भी पता है कि कर्म करते रहना है खाली नहीं बैठना है वस्तुतः जीवन गति का नाम है

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रपि च ते न प्रसिद्धड्ढेदकर्मणः।।

शरीर की यात्र तभी ठीक रहती है, जब कर्म से जुड़े रहते हैं। यदि कर्म से विमुक्त हो गए तो जीवनयात्र ठीक से चलने वाली नहीं है।
कर्म नियत एवं मर्यादित होकर करना। कर्मों में कभी मत उलझो। कर्म से कर्म को काटना, कर्म से कर्म के बंधन में नहीं आना। पांव में लगे कांटे को कांटे से निकालिये। फिर दोनों ही कांटों को उठाकर फेंक दीजिये। कर्म से कर्म को काटते चले जाएं, बन्धनों को तोड़ते चले जाएं और परमात्मा की ओर अपने कदम बढ़ते जाएं, यही भगवान श्रीकृष्ण का मानव जीवन के लिये सन्देश है और यही प्रभु भक्ति है। कर्म ही पूजा है।

कर्म की भी परीक्षा होती है। यदि थोड़ा-सा कर्म करके बैठ जाएं तो बात बनने वाली नहीं है। जैसे यज्ञों का अपना विधान है। कौन से यज्ञ में कितनी आहुति देनी है, उसका विधान हैं। ऐसे ही प्रत्येक कर्म का भी एक संविधान है। कर्म एक यज्ञ है, उसमें कितनी आहुति देनी पड़ेगी, कितने पसीने की बूंदे डालनी पड़ेंगी, कितनी मेहनत करनी पड़ेगी। यह निश्चय अवश्य करें। उतनी देर तक थके नहीं, हारे नहीं और घबराएं नहीं। अपना कर्म ज्ञानपूर्वक करते जाएं। इस तरह कर्म में कुशलता आने से दुर्भाग्य दूर हटकर सौभाग्य सामने आ जाता है।
इस संसार में सफलता उन्हीं को मिलती है। जो निष्ठापूर्वक कर्मों को सम्पन्न करता है और उसके सभी कर्म बिना फल की इच्छा से प्रभु को समर्पित होते हैं। ऐसा समर्पण ही भक्ति का रूप लेता है और फिर व्यक्ति का परमात्म भक्ति में खोये हुये विशुद्ध मन में ही सभी तीर्थों का वास हो जाता है।

शरदपूर्णिमा पर यज्ञ से होती है धन-समृद्धि और आरोग्यता की अमृत वर्षा

 

Sharad Purnima

शरदपूर्णिमा पर यज्ञ से होती है धन-समृद्धि और आरोग्यता की अमृत वर्षा

शरद ऋतु में आकाश के बादल वर्षा काल के बढ़े हुए जीव, पृथ्वी के कीचड़ और जल के मटमैलेपन को नष्ट कर देती है। जैसे ईश्वर की भक्ति ब्रह्मचारी गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यासियों के सब प्रकार के कष्टों और अशुभता को नष्ट कर देती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार सागर मंथन के समय धन-समृद्धि की देवी लक्ष्मी जी शरद पूर्णिमा के दिन ही समुद्र से उत्पन्न हुई थी। लक्ष्मी के आराधकजन पूर्णिमा की रात को रात भर जागकर चन्द्र देव का दर्शन करते हैं और लक्ष्मी माता की उपासना करते हैं। इस कारण शरदपूर्णिमा को कोजागरी के नाम से भी जाना जाता है।

इस रात चंद्रमा से अमृत वर्षा होती है। पूर्णिमा को व्रत रखकर कई देवी-देवताओं के पूजन का विधान है। शरद पूर्णिमा के दिन और रात का विशेष महत्व है। पूर्णिमा का दिवस जहां ईश्वर का आशीर्वाद प्रदान करता है तो वहीं पूर्णिमा की रात निरोगी काया का उपहार देती है।
ऐसी मान्यता है कि इस रात चन्द्रमा अपनी पूरी 16 कलाओं का प्रदर्शन करते हुए दिखाई देता है। मान्यता के अनुसार शरद पूर्णिमा की रात को माता लक्ष्मी स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर आती हैं और जो भी साधक उपासक उनकी पूजा, उपासना, यज्ञ-अनुष्ठान कर रहा होता है उसे धन-समृद्धि, प्रेम-प्रसन्नता आरोग्यता का वरदान देती है।

अतः इस पावन अवसर पर हर किसी को शुभ कर्म अवश्य करना चाहिए। सद्गुरु श्री
सुधांशु जी महाराज भक्तों के कल्याणर्थ प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा के अवसर पर आनंदधाम आश्रम में 108 कुण्डीय यज्ञ का आयोजन करवाते हैं। इस वर्ष 26 अक्टूबर से 5 नवम्बर तक 11 दिवसीय श्री गणेश लक्ष्मी और यजुर्वेद महायज्ञ किया जा रहा है। 31 अक्टूबर शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर मां महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति के लिए विशेष अनुष्ठानिक प्रयोग किए जा रहे हैं।
ऐसे शुभ अवसर पर हर किसी को इस यज्ञ में सहभागी बनना चाहिए। शरदपूर्णिमा के अवसर पर महायज्ञ में ऑनलाइन यजमान बनने के

संपर्क करें:- +91 8826891955, 7291986653, 9599695505, 9312284390, 9560792792

 

रोग-व्याधि नाशक और सुख-समृद्धिवर्धक है श्रीगणेश लक्ष्मी एवं यजुर्वेद महायज्ञ

Shree Ganesh Lakshmi and Yajurveda Mahayagya.

रोग-व्याधि नाशक और सुख-समृद्धिवर्धक है श्रीगणेश लक्ष्मी एवं यजुर्वेद महायज्ञ

प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों द्वारा आरोग्यता प्राप्ति एवं रोग-महामारी निवारण के लिए ‘भैषज’ यज्ञ किये जाते थे और लोग उनसे लाभ प्राप्त करते थे। ये यज्ञ ऋतुओं के संधिकाल में होते थे, क्योंकि इसी समय पर रोग-व्याधियों का ज्यादा प्रकोप होता था। इन यज्ञों की विशेषता होती थी कि इनमें आहुति दी गई हवन सामग्री वातावरण में फैलकर न केवल शारीरिक व्याधियां दूर करती थी अपितु इनके प्रभाव से व्यक्ति मानसिक बीमारियों से भी छुटकारा पा लेता था। यज्ञीय वातावरण से व्यक्ति के समग्र व्यक्तित्व विकास में अपूर्व सहायता मिलती थी।
लेकिन इसे विडम्बना ही कहना चाहिए कि वर्तमान समय की समस्त चिकित्सा पद्धतियां सिर्फ शारीरिक रोगों तक ही अपने आपको सीमित किए हुए हैं, जबकि मानसिक उपचार की आवश्यकता शारीरिक उपचार से भी कहीं अधिक है। वर्तमान में मानसिक रोगों की भरमार शारीरिक व्याधियों से कहीं अधिक है। यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि वर्तमान में 90 प्रतिशत व्यक्तियों को तनाव, अवसाद, अनिद्रा, चिंता, अविश, क्रोध, उत्तेजना, मिर्गी, उन्माद, सनक, निराशा, उदासीनता, आशंका, अविश्वास, भय आदि में से किसी न किसी मनोव्याधि से ग्रसित देखा जाता है।
यज्ञ अग्नि में हवन की हुई औषधीय सामग्री को सुवासित ऊर्जा शारीरिक रोगों के साथ विकृत मस्तिष्क अैर उत्तेजित मन को ठीक कर सकती है। इसका प्रमुख कारण है कि यज्ञ में होमी गयी सुगंधित औषधियों से जो ऊर्जा निकलती है, वह हल्की होने के कारण ऊपर उठती है और जब यह नासिका द्वारा अंदर खींची जाती है तो सर्वप्रथम मस्तिष्क, तदुपरांत फेफड़ों में, फिर सारे शरीर में फैलती है। उसके साथ औषधियों के जो अत्यन्त उपयेागी सुगंधित सूक्ष्म अंश होते हैं, वे मस्तिष्क के उन क्षेत्रों तक आ पहुंचते हैं, जहां अन्य उपायों से उस संस्थान का स्पर्श तक नहीं किया जा सकता। अर्थात् अचेतन मन की बाहरी परतों तक यज्ञीय ऊर्जा की पहुंच होती है और वहां जड़ जमाए हुए मनोविकारों को निकालने में यज्ञ से सफलता मिलती है।
सद्गुरु श्री सुधांशु जी महाराज द्वारा संचालित आनन्दधाम आश्रम में नित्य यज्ञ होता है और ट्टतुओं के संधिकाल अर्थात् अब गर्मी जा रही होती है और सर्दी का शुभागमन हो रहा होता है। मतलब नवरात्रि के बाद और दीपावली से पहले आनन्दधाम आश्रम में पिछले 20 वर्षों से 108 कुण्डीय श्री गणेश लक्ष्मी महायज्ञ का विराट आयोजन होता है। इस वर्ष 11 दिवसीय श्रीगणेश लक्ष्मी एवं यजुर्वेद महायज्ञ का पावन आयोजन 26 अक्टूबर से चल रहा है। जिसकी पूर्णाहुति 5 नवम्बर में होगी।
यह महायज्ञ महापुण्य फल देने वाला है। रोग महामारी को दूर कर यजमान भक्तों को धन-धान्य एवं सुख-समृद्धि से भरने वाला है। यज्ञ में सम्मिलित होने की हर व्यक्ति को कोशिश करनी चाहिए। चाहे एक ही दिन यज्ञ का सुअवसर मिले पर महायज्ञ में आहुति जरूर प्रदान करें। वैसे तो यज्ञ के हर एक दिन का अपना महत्व है, लेकिन 31 अक्टूबर को आने वाली शरदपूर्णिमा के पावन पर्व के सम्बन्ध में कहना ही क्या। अमृतवर्षा की पूर्णिका है शरद पूनम। बड़े भाग्यशाली लोगों को ऐसे अवसर पर महायज्ञ में यहमान बनकर सद्गुरु के श्रीमुख से यज्ञामृत का प्रसाद मिलता है। तो फिर देरी न करें महायज्ञ में यजमान बनें हैं तो अच्छी बात है अन्यथा जल्द से जल्द ऑनलाइन पंजीकरण करवाकर यज्ञ में सहभागी बनने का सौभाग्य प्राप्त करें।

धन-समृद्धि एवं सुबुद्धि के लिए यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ

धन-समृद्धि एवं सुबुद्धि के लिए यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ

धन-समृद्धि एवं सुबुद्धि के लिए यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ

मनुष्य के शरीर में जो महत्व उसकी रीढ़ की हड्डी का है यही महत्व हमारी संस्कृति में यज्ञ का है। वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है। प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखा रही है। कोविड-19 जैसी जानलेवा महामारी से पूरे विश्व में त्रहि-त्रहि मची है। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का शत्रु बनने को आतुर है। मानव मन एवं बुद्धि भ्रमित है। अशांति, व्याकुलता, मुसीबतें और परेशानियां मुंह फैलाकर मानवीय सुखों को ग्रसने के लिए मौका तलाश रही हैं, ऐसी विषम परिस्थिति में यज्ञ करना बहुत जरूरी है। यज्ञ से जहां वातावरण शुद्ध होने से रोग महामारियां दूर होती हैं वहीं यज्ञ हवियों से प्रसन्न होकर देवगण यज्ञकर्ता यजमान को धन, समृद्धि, सुख-ऐश्वर्य से समृद्ध बनाते हैं।
यजुर्वेद में यज्ञ अग्नि की परमेश्वर के रूप में प्रार्थना की गई है। वेद में अग्निदेव से प्रार्थना करते हुए कहा गया है कि हे अग्निदेव! आप हमें कल्याण के मार्ग पर ले चलो, हमेशा जागरूक होकर हमारी रक्षा करो।
अग्नि का पूजन कर यज्ञ करने वाले स्वर्ग के प्रतिनिधि होते हैं, वे स्वयं सुख-शांति, समृद्धि से युक्त जीवन जीते हैं तथा दूसरों के लिए भी सुखमय वातावण का निर्माण करते हैं। जब कोई इंसान अपनी कमाई को पुण्यकार्यों में लगाता है यज्ञकर्ता यजमान बनता है, उसका धन यज्ञीय कार्यों में लगता है तो उसका जीवन हमेशा कल्याण के पथ पर बढ़ता चला जाता है।
यज्ञ में जहां धन-समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी का पूजन आवाहन करना चाहिए वहीं लक्ष्मी माता के साथ बुद्धि बल प्रदाता भगवान गणपति जी का श्रद्धापूर्वक अर्चन करना चाहिए। ऐसा करने से धन-समृद्धि के साथ सुबुद्धि भी आती है। क्योंकि केवल धन मिल जाये और बुद्धि न मिले तो व्यक्ति का धन का दुरुपयोग करता है। जब धन के साथ बुद्धि भी आ जाती है तो वह धन धन्य हो जाता है।
अतः शुभ-लाभ अर्जन के लिये, सुख समृद्धि की वृद्धि के लिए अपने परिवार के स्वस्थ्य सुखमय जीवन के लिये, बच्चों की उत्तम शिक्षा व उज्जवल भविष्य के लिए यज्ञ में यजमान जरूर बनें।
कोरोना के इस विषम काल में पूज्य सद्गुरु श्री सुधांशु जी महाराज घर बैठे महायज्ञ में ऑनलाइन यजमान बनकर यज्ञ का पुण्यफल प्राप्त करने का सुअवसर दे रहे हैं। आप आनन्दधाम आश्रम दिल्ली में 26 अक्टूबर से 5 नवम्बर, 2020 तक आयोजित 108 कुण्डीय यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ में ऑनलाइन यजमान बनकर पुण्य प्राप्त करें।

सम्पर्क करें:- +91 8826891955, 7291986653, 9599695505, 9312284390, 9560792792
Online Booking:- https://www.vishwajagritimission.org/shri-ganesh-lakshmi…/

पुरुषोत्तम मास में पूजा, यज्ञ, दानपुण्य का अनन्त फल |

पुरुषोत्तम मास में पूजा, यज्ञ, दानपुण्य का अनन्त फल

पुरुषोत्तम मास में पूजा, यज्ञ, दानपुण्य का अनन्त फल

धर्मशास्त्रें के अनुसार मलमास में सूर्य संक्रांति न पड़ने और इस मास न कोई विशिष्ट नाम और स्वामी होने से यह अधिकमास देव, पितर पूजा, मंगल कृत्यों के लिए अनुपयोगी कहा जाने लगा तब मलमास दुखित होकर श्री विष्णु लोक बैकुंठधाम में गया। वहां मणि जड़ित सिंहासन पर विराजमान श्री विष्णु जी को दण्डवत प्रणाम कर अपना दुःख निवेदित करने लगा।
मलमास को दुखित देखकर भगवान करुणानिधान द्रवित हो गए। भगवान ने कहा मेरे इस लोक में तो काई दुखित नहीं है, परंतु तुम परेशान क्यों हो? मलमास ने कहा प्रभो! न तो मेरा कोई नाम है, न कोई मेरा स्वामी, न कोई आश्रय, निराश्रय हूं मैं, अनाथ हूं मैं। इसलिए भगवन सब मेरा तिरस्कार करते हैं।
ऐसा सुनकर दीनबन्धु कृपानिधान श्री विष्णु भगवान बोलेµवत्सागच्छमया सार्धंगोलोकं योगि दुर्लभम्। यत्रस्ते भगवान् कृष्णः पुरुषोत्तम ईश्वरः।। मलमास तुम मेरे साथ गोलोक धाम चलो वहां भगवान श्री कृष्ण रहते हैं। उस दिव्य लोक में बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, भय, रोग, महामारी किंचित किसी को भी नहीं है।
भगवान श्री विष्णु ने मलमास को गोलोक धाम में ले जाकर प्रभु श्रीकृष्ण के चरणों में नतमस्तक कराया। भगवान श्रीकृष्ण बोले हे श्री विष्णु जी! आप इसे साथ लेकर आए हैं, अब मैं इसे अपने समान करता हूंµअहमेते यथा लोके प्रथितः पुरुषोत्तमः। तथायमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः।। अर्थात् जितने गुण मुझमें हैं, जिनसे मैं विश्व में पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूं। उसी प्रकार मलमास भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध होगा। मैं स्वयं इस मास का स्वामी हो गया हूं। इस मास में किए जाने वाले व्रत, उपवास, पूजा, यज्ञ, दानपुण्य सभी पुण्य कर्म इसमें अनन्त फल देने वाले होंगे।
विश्व जागृति मिशन द्वारा आनन्दधाम आश्रम, नई दिल्ली में पुरुषोत्तम मास में आयोजित पूजा, यज्ञ, जप, भागवत कथा, आरती में ऑनलाइन यजमान बनकर आप पुरुषोत्तम मास का अनन्त पुण्य फल प्राप्त करें। साथ ही जैसे निराश्रय अनाथ मलमास को अपनाकर भगवान श्रीकृष्ण ने उसे सर्वश्रेष्ठ बना दिया। वैसे ही मिशन द्वारा संचालित देवदूत बालकल्याण योजना में दान-सहयोग कर गरीब, अनाथ बच्चों की शिक्षा-दीक्षा, पालन-पोषण में सहभागी बनें। भगवान पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण आपकी हर शुभ मनोकामना पूरी करेंगे।

कैसे पाएं नारायण की विशेष कृपा और लक्ष्मी का स्थिर वास

How to get Narayana's special grace and Lakshmi's abode

पुरुषोत्तम मास की पूजा से भक्तों के जीवन में नारायण की विशेष कृपा और लक्ष्मी का स्थिर वास

श्रीमद्भागवत पुराण हमारे अठारह पुराणों में से एक सर्वश्रेष्ठ पुराण है। यह ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का महान ग्रन्थ है। यह पावन पुराण हजारों वर्षों से हमारे समाज की धार्मिक, सामाजिक और लौकिक मर्यादाओं की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस पुराण में वेद, उपनिषद् तथा दर्शन शास्त्र के गूढ़ एवं रहस्यमय तवषयों को अत्यन्त सरलता के साथ बताया गया है।
भागवत पुराण में पुरुषों में उत्तम अवतार अर्थात् पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की लीला-कथा का वर्णन है। भागवत भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात् वाणी स्वरूप ग्रंथ है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जहां भगावन की पावन भागवत कथा होती है और जहां भागवत पुराण स्थापित होता है मैं स्वयं वास करता हूँ। भागवत कथा के साथ मैं इस तरह से रहता हूँ, अपने नवजात बच्चे को चाहने वाली गाय अपने बछड़े से पल भर के लिए भी दूर नहीं रहना चाहती। इसलिए कहना चाहिए जहाँ-जहाँ भागवत कथा वहाँ-वहाँ भगवान श्रीकृष्ण।
भागवत कथा पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन-समृद्धि चाहने वाले को धन-समृद्धि, स्वास्थ्य सुख की कामना करने वाले को उत्तम स्वास्थ्य, भक्ति-मुक्ति की कामना करने वाले को ईश्वर के चरणों में अनुराग और मोक्ष प्रदाता है। सबसे बड़ी बात कि भागवत श्रवण अशांत मन को शांति प्रदान करती है।
जैसे भगवान श्रीकृष्ण का वाणी का स्वरूप है ‘भागवत पुराण’ उसी तरह से ‘पुरुषोत्तम मास’ भगवान का दूसरा रूप है। पुरुषोत्तम मास की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने इसे अपना रूप और नाम दिया और उन्होंने कहा इस अधिक मास का स्वामी मैं स्वयं हूँ। पुरुषोत्तम मास अब मेरी ही तरह जगत् में पूजनीय होगा और इस मास में पूजा-पाठ-यज्ञ-अनुष्ठान, कथा श्रवण से भक्तों के दुःख-दारिद्र्य का नाश होगा। इस मास में किए जाने वाले हर पुण्य कार्य अनंत गुना फल देने वाले होंगे।
इस अधिक मास के व्रत, पूजन, दान से एक ओर जहां भगवान नारायण प्रसन्न होते हैं वहीं नारायण की प्रिय लक्ष्मी अपने प्रिय प्रभु के पूजन से प्रसन्न होकर भक्त के जीवन में स्थायी रूप से वास करती हैं। इस पावन महीने में भगवान लक्ष्मी नारायण, श्री राधाकृष्ण के मंदिरों में उनके श्रीविग्रह का दर्शन-पूजन अतयंत फलदायी है। लेकिन कोरोना के इस विषम काल में मंदिरों में जाकर भगवान जी का दर्शन पूजन कर पाना हर किसी भक्त के लिए सम्भव नहीं हो पायेगा।
कोरोना की विषम परिस्थिति का ध्यान रखते हुए परम दयालु गुरुदेव पूज्य श्री सुधांशु जी
महाराज ने भक्तों के लिए घर बैठे पुरुषोत्तम मास की पूजा-पाठ, देव-दर्शन, यज्ञ-अनुष्ठान करवाने एवं पवित्र भागवत कथा आदि सुनने की ऑनलाइन व्यवस्था करवाई है। आप अपने घर से ही गुरुतीर्थ आनन्दधाम में विराजमान देवी-देवताओं के दर्शन और पूजन का पुण्य लाभ ले सकते हैं।
आप ऑनलाइन यजमान बनकर विष्णु सहड्डनाम पाठ, पुरुषोत्तम यज्ञ, रामचरित मानस पाठ, सुंदरकाण्ड पाठ, श्रीसूक्त पाठ, गजेन्द्र मोक्ष पाठ, रामरक्षा स्तोत्र पाठ, नारायण अथर्वशीर्ष पाठ, नारायण कवच, पुरुषोत्तम मास कथा, भागवत कथा, पुरुषसूक्त पाठ, मंत्र जप, यज्ञ आदि करवा सकते हैं।
पावन पुरुषोत्तम (अधिक मास) मास में पूजा-पाठ, जप, यज्ञ-अनुष्ठान करवाकर भगवान नारायण और मां महालक्ष्मी की अनंत-अनंत कृपा व पुण्य फल प्राप्ति के लिए विश्व जागृति मिशन के युगट्टषि पूजा एवं अनुष्ठान केन्द्र में सम्पर्क करें।
सम्पर्क सूत्र: —————————————

आध्यात्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी अति लाभकारी है यज्ञ

आध्यात्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी अति लाभकारी है यज्ञ
आइए! ऑनलाइन यजमान बनें आनन्दधाम के यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ में विश्व कल्याण की भावना से ओतप्रोत वैदिक संस्कृति के मूल आधार हैं ‘वेद’ और वेद ‘यज्ञमय’ हैं। जिस कर्म विशेष में देवता हवनीय द्रव्य, वेदमंत्र, ट्टत्विक और दक्षिणा इन पांचों का संयोग हो उसे यज्ञ कहते हैं।
हमारे देश की धार्मिकता और यज्ञ परम्परा समपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। हमारे देश की धार्मिकता और यज्ञीय परम्परा से संतुष्ट होकर देवगण सर्वदा यहीं निवास कते हैं। इसलिए हमारे देव भारतवर्ष को ‘देवभूमि’ कहा गया है।
जिस प्रकार श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितर तृप्त और संतुष्ट होते हैं, उसी प्रकार यज्ञ की अग्नि में हवनीय द्रव्य हवन करने से देवत तृप्त और संतुष्ट होते हैं। ‘देवतोद्देशेन अग्नौ हविर्द्रव्यत्यागो यागः’ के अनुसार देवी-देवताओं की प्रसन्नता के उद्देश्य से अग्नि में हविर्द्रव्य का जो त्याग किया जाता है, उसे यज्ञ कहते हैं।
गीता के अठारहवें अध्याय के पांचवे श्लोक में लिखा है कि यज्ञ, दान और तप ये तीनों मनुष्यों को पावन करते हैं, इसलिए हर एक व्यक्ति को अपने जीवन में इन चीजों को अवश्य अपनाना चाहिए।
यज्ञ से अनंत आध्यात्मिक और दैवीय लाभ तो हैं ही, यज्ञ के वैज्ञानिक सिद्धांतों पर भी अनेकानेक लाभ हैं। यज्ञ पर हुए कई वैज्ञानिक शोधों और अनुसंधानों से पता चला है कि यज्ञ से उठने वाले धुएं से वायु में मौजूद 94» हानिकारक जीवाणु-विषाणु नष्ट हो जाते हैं। साथ ही इसके धुएं से वातावरण शुद्ध होता है और बीमारियों के फैलने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।
शोध से पता चलता है कि यज्ञ का धुंआ वातावरण में 30 दिन तक बना रहता है और उस समय तक जहरीले कीटाणु नहीं पनप पाते। यज्ञ धूम्र से न केवल मनुष्य के स्वास्थ्य पर अच्छा असर पड़ता है अपितु यह खेती में भी काफी लाभकारी सिद्ध हुआ है। खेतों में मौजूद फसल के लिए हानिकारक कीटाणु भी यज्ञ धूम्र से नष्ट हो जाते हैं। शोध यह भी कहता है कि मनुष्य को दी जाने वाली दवाओं की तुलना में यज्ञ का औषधियुक्त धुआं काफी लाभदायक है। यज्ञ के धुएं से शरीर में पनप रहे रोग खत्म हो जाते हैं, जबकि दवाएं रोग-बीमारियों को दबा तो जरूर देती हैं लेकिन इनके कुछ-न-कुछ दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) भी जरूर रह जाते हैं।
वैज्ञानिक शोध से यह भी सिद्ध हुआ है कि यज्ञ में हवनीय पदार्थ के मिश्रण से एक विशेष तरह का गुण तैयार होता है, जो हवन होने पर वायुमंडल में एक विशिष्ट प्रभाव पैदा करता है। वेद मंत्रें के उच्चारण की शक्ति से उस प्रभाव में और अधिक वृद्धि होती है।
वैज्ञानिक अभी तक कृत्रिम वर्षा कराने में सफल नहीं हो पाये लेकिन यह देख गया है कि यज्ञ द्वारा वर्षा हुई है। कई लोग वर्षा कराने के लिए यज्ञ का सहारा लेते हैं और जहां यज्ञ होता है वहां के आसपास के खेतों में अच्छी फसल भी होती है। प्रचुर अन्न उपजता है।
यज्ञीय प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है आनन्दधाम आश्रम के आसपास के खेतों की हरियाली जहां आज से 20 वर्ष पूर्व बहुत कम फसलें होती थी। वहां आज हरी-भरी नर्सरियां हैं, खेतों में बहुतायत में अन्न उपजता है। आसपास के गावों के लोग बताते हैं कि पहले यहां कुछ भी नहीं बोया जाता था। जंगल जैसा स्थान था लेकिन जब से गुरुवर सुधांशु जी महाराज ने यहां आश्रम बनाकर यज्ञ करवाना शुरू किया तब से यहां के क्षेत्र में हरियाली ही हरियाली है। बीते काफी समय से आश्रम में सेवारत सेवादारों और कर्मचारियों ने भी यह प्रत्यक्ष तौर पर देखा है।
आनन्दधाम आश्रम में विगत 20 वर्षों  से होता आ रहा यज्ञ इस वर्ष अति विशेष है। हर वर्ष जहां श्रीगणेश लक्ष्मी यज्ञ का पंचदिवसीय आयोजन किया जाता था वहीं इस वर्ष यजुर्वेद यज्ञ के साथ श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ का 11 दिवसीय आयोजन किया जा रहा है। यह 108 कुण्डीय महायज्ञ 26 अक्टूबर से 5 नवम्बर तक आयोजित किया जायेगा।
महायज्ञ में 26 से 30 अक्टूबर पांच दिन तक यजुर्वेद के मंत्रें से विशेष आहुतियां दी जाएंगी और प्रतिदिन श्रीगणेश लक्ष्मी के दिव्य अर्चन एवं कुछ आहुतियां भी दी जाएंगी। 31 अक्टूबर से 5 नवम्बर, 2020 मे छः दिन श्रीगणेश-लक्ष्मी के महामंत्रें से विशेष आहुतियां दी जाएंगी और प्रतिदिन कुछ आहुतियां यजुर्वेद के मंत्रें से भी दी जाएंगी।
महाराज श्री के सान्निध्य में वेदपाठी ब्राह्मणों द्वारा किया जाने वाला यह यजुर्वेद एवं श्रीगणेश लक्ष्मी महायज्ञ भक्तों के लिए स्वास्थ्य-सुख, धन-समृद्धि, नौकरी-व्यापार में उन्नति-प्रगति के साथ हर शुभ मनोकामना पूर्ण करने वाला है। इसलिए हर व्यक्ति को इस यज्ञ में यजमान बनकर यज्ञ का लाभ लेना चाहिए। भक्तजन घर बैठे ऑनलाइन यजमान बनकर यज्ञ का पुण्यफल प्राप्त करें।
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पुरुषोत्तम मास (मलमास) में पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठान से पाएं अनंत पुण्य-फल

पुरुषोत्तम मास (मलमास) में पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठान से पाएं अनंत पुण्य-फल

पुरुषोत्तम मास (मलमास) में पूजा-पाठ, यज्ञ-अनुष्ठान से पाएं अनंत पुण्य-फल

हिंदू धर्म में जहां अधिकमास का विशेष महत्व है, वहीं ज्योतिष शास्त्र के लिहाज से भी इसे काफी विशेष माना जाता है। इस वर्ष जो अधिकमास आने वाला है, उसे काफी शुभ माना जा रहा है। ज्योतिष विद्वानों का मानना है कि ऐसा शुभ संयोग पुरुषोत्तम मास 160 वर्ष बाद बन रहा है और इसके बाद ऐसा शुभ मलमास 2039 में आएगा।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब धरती के घूमने के कारण दो वर्षों के बीच करीब 11 दिनों का फासला हो जाता है तो तीन साल में करीब एक महीना के बराबर का अंतर आ जाता है। इसी अंतर के कारण हर तीन साल में एक चंद्र मास आता है। हर तीन साल में बढ़ने वाले इस माह को ही अधिकमास या मलमास कहा जाता है। भारतीय हिंदू कैलेंडर मे सूर्य और चंद्र की गणनाओं के आधार पर चलता है। अधिकमास दरअसल चंद्र वर्ष का एक अतिरित्तफ़ भाग है, जो हर 32 माह, 16 दिन और 8 घंटे के अंतर से आता है। भारतीय गणना पद्धति के अनुसार हर सूर्य वर्ष 365 दिन और 6 घंटे का माना जाता है। वहीं चंद्र वर्ष 365 दिनों का माना जाता है। यानी दोनों में करीब 11 दिनों का अंतर होता है, जो तीन वर्ष में एक माह के लगभग हो जाता है। इसी कारण इसे अधिकमास कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता है कि अधिकमास के अधिपति स्वामी भगवान विष्णु हैं और पुरुषोत्तम भगवान विष्णु का ही एक नाम है, इसलिये अधिकमास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। जब अधिकमास को कोई नहीं अपना रहा था तो भगवान विष्णु की कृपा पर भगवान श्रीकृष्ण ने अधिकमास को अपनाकर उसे पुरुषोत्तम मास का नाम देकर इस महीने को सर्वपूज्य बना दिया। कहा जाता है पुरुषोत्तम मास की पूजा साक्षात् नारायण भगवान श्रीकृष्ण की पूजा है। इस महीने में गीता-रामायण, भागवत, विष्णु-पुराण, विष्णु सहड्डनाम के पाठ जाप-यज्ञ-अनुष्ठान से अनन्त पुण्य फल मिलता है।
आनन्दधाम के ‘‘युगऋषि पूजा एवं अनुष्ठान केन्द्र’’ में पुरुषोत्तम मास में की जाने वाली सभी प्रकार की पूजा-पाठ यज्ञ-अनुष्ठान की व्यवस्था उपलब्ध है। भक्तजन ऑनलाइन यजमान बनकर इस पवित्र और पुण्यमय पुरुषोत्तम मास का पुण्य लाभ लें।

विश्वव्यापी स्वर्णिम शिक्षा व्यवस्था का संदेश देते हमारे गुरुकुल | Vishwa Jagriti Mission

आधुनिक शिक्षानीति के परिप्रेक्ष्य में हमारे गुरुकुल
किसी राष्ट्र के चरित्र को बदलने में शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विश्व के अनेक देशों ने सदियों से अपनी शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाकर ऊँचाइयां छुईं, तो अनेक देश सही शिक्षानीति के अभाव में दरिद्रता, कंगाली, बदहाली के कगार पर आ गये। वर्तमान भारत एवं उसकी संस्कृति में अनेक परिवर्तन देखने को मिले हैं, जिसे तत्कालीन शासकों द्वारा शिक्षा नीति के सहारे लाये गये। अंग्रेजी शिक्षा नीति लार्ड मैकाले का दंश तो आज तक भारत को झेलना पड़ रहा है। वर्तमान में भारत की शिक्षा नीति में नवीनता लाकर देश के प्राचीन गौरव को वापस लाने की दिशा में हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री द्वारा उठाया कदम मील का पत्थर साबित होगा, ऐसी आशा की जा सकती है। पुनः भारत को इसके द्वारा विश्व गौरव पाने का सुयोग मिलेगा, जैसा कभी हमारे ऋषियों द्वारा स्थापित गुरुकुल परम्परा का आदर्श था। गुरुकुल शिक्षा पद्धति को भारत देश व विश्ववासी स्वर्णिम शिक्षा व्यवस्था का दर्जा आज भी देते हैं। प्रस्तुत है हमारी गुरुकुल शिक्षा पद्धति की कुछ विशेषतायें—।
हमारी गुरुकुल परम्परा एक सोच है, संकल्प है, स्वभाव है। अवधारणा है, जीवनशैली है, समाज व्यवस्था के लिए नेक इंसान देने की टकसाल है। हमारे प्राचीन ऋषियों द्वारा मानव निर्माण के लिए तैयार की गई शोधपूर्ण व्यवस्था है। जहां प्रवेश करने वाला विद्यार्थी गुरु व आचार्य के संरक्षण में कुछ वर्ष बिताने के बाद वह बालक दिखता तो उसी आकार में ही है, पर उसके अंतःकरण में श्रेष्ठ देवत्व भाव उदित हो जाते हैं। उसकी प्रकृति में आमूल चूल बदलाव आते हैं।

प्राणीमात्र के प्रति सम्वेदनाः
ईमानदारी, सहिष्णुता, सौहार्द, सेवाभाव, परिवार व्यवस्था और अतिथि सत्कार, अन्य लोगों के काम आना, दूसरों की सेवा, सहायता व उपकार करना गुरुकुल से निकलना विद्यार्थी अपना सौभाग्य समझता था। ऐसे ही दिव्य आचरण की श्रेष्ठता और चरित्र की उच्चता के चलते भारत विश्व गुरु रहा। खुद का हित साधन करने से पहले औरों के हित का ध्यान रखने की परम्परा भी तो हमारी रही। यहां लोग खाने से ज्यादा खिलाने में आनन्द महसूस करते हैं। यहां की सभ्यता में आहार खुद ग्रहण करने से पहले उस चींटी, गाय, कुत्ता आदि पालतू व अन्य सान्निध्य के जीवों के आहार का ख्याल रखा जाता था। प्रसाद स्वरूप बचा हुआ भोजन खुद ग्रहण करने का यहां रिवाज आज भी बहुत से भारतीय परिवारों में देखी जाती है, यह सब कुछ गुरुकुल की ही देन है।

सेवा-सद्भावः
यहां गरीब से गरीब भी परोपकार के लिए बाग-बगीचे लगवाने, कुएं-तालाब खुदवाने, अन्न क्षेत्र चलवाने, अस्पताल-धर्मशाला खुलवाने, देवालयों का निर्माण करवाने, विद्यालयों में शिक्षण आदि जनकल्याणकारी कार्यों को अंजाम देने में गौरवान्वित महसूस करता था। हमारी गुरुकुल शिक्षा नीति हर भावी पीढ़ी में यही संस्कार तो उगाता आ रहा है सदियों से। वास्तव में गुरुकुल ऐसे ही दिव्य मानवों के निर्माण के केन्द्र हैं, जहां गढ़े गये विद्यार्थी परिवार-समाज के बीच अपने शुभ संस्कारों, ज्ञान, चरित्र, स्वभाव, सहकारिता पूर्ण दृष्टिकोण के सहारे देवत्व की स्थापना करते हैं और धरती पर स्वर्ग ले आने के लिए जीवन जीते हैं।
गुरुकुल पद्धति के विद्यार्थियों को प्राचीन संस्कारपरक आर्ष ग्रंथों की शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान परक विषयों के प्रति भी निष्णात बनाया जाता है। इन्हें धार्मिक सद्ग्रंथों का विज्ञान सम्मत अध्ययन इसलिए कराया जाता है, जिससे वे अपने जीवन को विसंगतियों वाले अन्धकार व अविद्या से मुक्त कर समाज, राष्ट्र तथा विश्व को दिव्य ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर सकें। गुरुकुलों की दिनचर्या भी विज्ञान सम्मत एवं ऋषि परम्परा पूरक सेवा संकल्पों के अनुरूप रखी जाती है।

मनोविज्ञान का संयोजनः
यहाँ बच्चों को ऐसा वातावरण दिया जाता है कि उनका जागरण एवं शयन आनन्द से भरा रह सके। प्रातःकाल जागरण, भगवद् स्मरण, उषापान, नित्यकर्म, व्यायाम, यज्ञाग्निहोत्र, प्रातराश, अध्ययन, दोपहर भोजन, विश्राम, पुनः अध्ययन, सन्ध्योपासना, रात्रि भोजन, भ्रमण, अध्ययन, फिर ईशस्मरण के साथ रात्रि शयन तक सूक्ष्म मनोविज्ञान का कुशल संयोजन देखने को मिलता है। गुरुकुल के विद्यार्थियों की इस तपः पूर्ण दिनचर्या में उनके आचार्य साथ-साथ सहभागीदार बनकर चलते हैं।
इस प्रकार बच्चों की बहुमुखी एवं सर्वांगीण प्रतिभा विकास का अनुपम उदाहरण होते हैं यह गुरुकुल। वर्तमानकाल में स्कूल, कॉलेज की शिक्षाओं में विद्या की कीमत ली जाती है, जबकि आज भी गुरुकुलों का लक्ष्य राष्ट्र की नयी पीढ़ी गढ़ना है, वह भी निःशुल्क।

सर्वांगीण विकासपरक शिक्षणः
विद्यार्थी एवं आचार्य के बीच गहन समन्वय एवं उनके आचार्यों की सतत करुणाभरी दृष्टि के परिणाम स्वरूप गुरुकुलों में शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी विद्यार्थी एक से बढ़कर एक संवेदनशील, सेवाभावी, मेधावी, कुशाग्र बुद्धि वाले बनते हैं। ये आचार्यों के दिशा निर्देशन में अपने पाठ्यक्रम को पूरा करते ही हैं, साथ ही प्राचीन-अर्वाचीन वांगमय वेद-उपनिषद, रामायण, पुराण, स्मृति-ग्रंथ, महापुरुषों के जीवन चरित्र और अन्य सामाजिक, वैज्ञानिक, पठनीय साहित्य के स्वाध्याय, चिंतन-मनन-शोध में भी अहर्निश संलग्न रहते हैं।
बच्चों का सर्वांगीण विकास हो इस हेतु संगीत सहित अनेक प्रकार की जीवन से जुड़ी शिक्षा से भी जोड़कर इनमें समाज के लोकरंजन से लोकमंगल की अवधारणा जगाई जाती है। कर्मकाण्ड की कक्षाओं से लेकर जप-तप-यज्ञ-अनुष्ठान-ज्योतिष विद्या, दर्शन, नीति, व्याकरण आदि में भी विशेष अभिरुचि जागृत की जाती है। विद्यार्थियों को शारीरिक रूप से सबल बनाने के लिए नित्य नियम पूर्वक व्यायाम, खेल-क्रीड़ा की विशेष ट्रेनिंग देकर प्रतियोगिताओं के लिए इन्हें तैयार किया है, जाता जिससे राष्ट्रहित में अतिरिक्त कुशलता ला सकें। वास्तव में विद्यार्थियों की प्रतिभा पूर्ण विकसित हो, इस बात को ध्यान में रखते हुए उन्हें दिव्य वातावरण देने का कार्य गुरुकुल करते हैं। ऐसा विद्यार्थी गढ़ना जिससे यह राष्ट्र अपने गौरवपूर्ण परम वैभव को पा सके, यही गुरुकुल और आचार्य दोनों का लक्ष्य होता है।

खेल, श्रम और सेवापरक शिक्षणः
मन को एकाग्र एवं व्यक्तित्व के विकास के लिए खेल, श्रम और सेवा भी महत्वपूर्ण क्रिया है, यह बात गुरुकुल में प्रारम्भ से ही अनुभव करायी जाती है। शारीरिक विकास के लिए खेल, श्रम और सेवा तथा व्यायाम से उसे जोड़ा जाता है। ऋषियों द्वारा अनुसंधित उपयोगी योगासन, सर्वांगपूर्ण व्यायाम इस विधि से कराया जाता है कि विद्यार्थियों के जीवन में एकाग्रता एवं प्रसन्नता पैदा हो सके। नियुद्ध जैसी कलायें गुरुकुल की प्राचीन विरासत में हैं, इससे भी विद्यार्थी जुड़ते हैं।
हंसने से मस्तिष्क विकसित होता है, यह कहावत नहीं विज्ञान है। गुरुकुलों में विद्यार्थी को दिन में अनेक बार निःसंकोच होकर हंसने का अवसर दिया जाता है। हंसने का आशय किसी पर व्यंगात्मक प्रयोग नहीं, अपितु अच्छी प्रवृत्तियों पर आंतरिक प्रसन्नता भाव जगाना है। इसी प्रकार स्वस्थ पूर्ण श्रम से बच्चे में धैर्य भाव विकसित होता है। आज की शिक्षा में तो यह सब गायब सा हो गया है। मन में गांठ खोलने, स्वभाव को सौम्य, शिष्ट और प्रसन्नचित हंसमुख बनाकर रखना बच्चों के साथ देश के उज्जवल भविष्य का संकेत है। इसलिए गुरुकुल में योग-व्यायाम खेल, श्रम, सेवा के कई बहाने दिये जाते हैं।

व्यावहारिक चुनौतियों से जुड़ावः
सफलता के शिखर पर पहुंचने के लिए बच्चों को ऐसे व्यवहार परक सूत्र सिखाये जाते कि छोटी-छोटी असफलताओं में वह हताश न हों, सफलता की ऊंचाई पर पहुंचकर, वहां स्थिर रहने, निरन्तर अपनी क्षमताओं को बढ़ाते, विकास की यात्रा को लगातार जारी रखने के अभ्यास कराये जाते। इसके लिए उन्हें समाज व्यवस्था के अनेक व्यावहारिक प्रयोगों से गुजारा जाता है। व्यवहारिक सूत्रों में सफलता के लिए सबसे पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करना, लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण, असफलता से डरकर प्रयास कभी न छोड़ना, आलस्य और प्रमाद को अपने पास मत आने देना, अहंकार से सदैव बचकर रहने की कला, सीखने की लालसा, लगन और मेहनत को बढ़ाते रहना, हिम्मत और हौसला कभी मत हारना, चुनौतियों का डटकर सामना करना। जैसे सूत्रों का व्यावहारिक प्रयोग उनसे कराये जाते, ताकि बुरी से बुरी विपरीत स्थिति में वे हताश-निराश न हों और अपने को खड़ा कर सके। श्रेष्ठ स्तर के निर्णय करने की आदत बनाना भी उनके शिक्षण का हिस्सा रहता। संतुलन बनाकर शांति से परिस्थितियों पर विचार करना आदि गुण गुरुकुल के आचार्यों द्वारा विद्यार्थियों में विकसित कराये जाते हैं।

पितरों को सम्मान देने का पक्ष है पितृपक्ष

पितरों को सम्मान देने का पक्ष है पितृपक्ष

पितरों को सम्मान देने का पक्ष है पितृपक्ष

हिन्दू धर्म के शास्त्रें में तीन प्राकर के ऋणाों के बारे में बताया गया है। देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण और इनमें से पितृ ऋण से निवारण हेतु ही पितृ यज्ञ अर्थात् श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है। प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के काल को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहते हैं। श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जाना जाता है। महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। जिन व्यक्तियों को अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि की सही दिन-तारीख नहीं पता हो, वे लोग इस दिन उन्हें श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित करके याद करते हैं। पितरों की तृप्ति के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिण्ड दान अर्थात् पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन, जल आदि को ही श्राद्ध कहते हैं। मान्यता अनुसार सूर्य के कन्याराशि में आने पर पितर परलोक से उतर कर अपने पुत्रें-पौत्रें के साथ रहने आते हैं, अतः इसे कनागत भी कहा जाता है। तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा माना जाता है। श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। हिन्दू शास्त्रें के अनुसार पितृपक्ष में तर्पण व श्राद्ध करने से व्यक्ति को पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिससे घर में सुख-शांति एवं समृद्धि बनी रहती है। शास्त्रें के अनुसार पितर ही अपने कुल की रक्षा करते हैं।

श्राद्ध के सम्बन्ध में हमारे धर्म-ग्रन्थों में उल्लेख है

(a). गरुड़ पुराण के अनुसार ‘पितृ पूजन (श्राद्ध कर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुऽ, धन और धान्य देते हैं।’
(b) मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ‘श्राद्ध से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या सुऽ, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।’
(c). ब्रह्मपुराण में वर्णन है कि ‘श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक किए हुए श्राद्ध में पिण्डों पर गिरी हुई पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदों से पशु-पक्षियों की योनि में पड़े हुए पितरों का पोषण होता है। जिस कुल में जो बाल्यावस्था में ही मर गए हों, वे सम्मार्जन के जल से तृप्त हो जाते हैं।’
(c). ब्रह्मपुराण के अनुसार जो व्यत्तिफ़ शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भत्तिफ़ से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःऽी नहीं होता।
(d). विष्णु पुराण के अनुसार श्रद्धायुत्तफ़ होकर श्राद्ध कर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं।
(e). यमस्मृति के अनुसार ‘जो लोग देवता, ब्राह्मण, अग्नि और पितृगण की पूजा करते हैं, वे सबकी अंतरात्मा में रहने वाले विष्णु की ही पूजा करते हैं।’
इसलिए हर व्यक्ति को चाहिये कि भाद्रपद की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से प्रारंभ कर आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक सोलह दिन पितरों का तर्पण और उनकी मृत्युतिथि को श्राद्ध अवश्य करें। ऐसा करके आप अपने परम आराध्य पितरों के श्राद्धकर्म द्वारा आध्यात्मिक, आधिदैविक एवं आधिभौतिक उन्नति को प्राप्त कर सकते हैं।

श्राद्ध में इसलिये दी जाती हैं ये जीवों को सेवाएं

1- गोमाता में तैंतीस कोटि देवों का निवास है।
2- कुत्ता केतु का प्रतीक है उसका रोना तथा असमय में भौंकना अशुभ है।
3- कौआ न्यायकारी शनि का वाहन है तथा पूर्वजों का परिचायक है।
4- चीटियां कर्मठता तथा भगवान विष्णु का प्रतीक हैं।
5- देवता तथा अन्य शक्तियां हमारी इच्छाओं एवं संकल्पों की पूर्ति करती हैं।
अतः पंचबलि करने से देवों की प्रसन्नता, अशुभ का निवारण, न्याय एवं पितरों का प्यार, भगवान विष्णु की तरह उदारता व गंभीरता तथा अनेक प्रकार की समस्याओं का समाधान प्राप्त होता है। पंचबलि से हमारे अन्न की शुद्धता होती है जिससे हमारी बुद्धि एवं मस्तिष्क की शुद्धि होती है।