Ek Shaam Prabhu Ke Naam | Sudhanshu Ji Maharaj | Kathmandu | 2019

Ek Shaam Prabhu Ke Naam | Sudhanshu Ji Maharaj | Kathmandu | 2019

Ek Shaam Prabhu Ke Naam | Sudhanshu Ji Maharaj | Kathmandu | 2019

On June 17, 2019 in the sacred capital of Nepal, Kathmandu, HH Sudhanshuji Maharaj gave useful sermons on five important tips to be successful and happy in life.
First, Maharajshri emphasized on good health without which nothing is possible. Secondly, he stressed on economic independence, i.e. we must not depend on others for daily living and in case of emergency. Thirdly, there should be warmth and care within the family we live in. Fourthly, our deeds should be admired in the society so that we may set as an example of a positive deed. Lastly, he underlined that the need to show intense devotion and total faith in both God and Guru is of utmost importance.
These inspiring words were addressed by Maharajshri in the event entitled “Ek Shaam Prabhu Ke Naam”.

The event was organised by Agrawal Sewa Kendra, under the sponsorship of Shri Purshottam Ji Shanghai in the august presence of chief coordinator Ramakantji Agrawal ( Hong Kong-based), Advisor Rajendraji Khetan who is the President of Agrawal Bhavan, respected members of Dhanuka, Shanghai and Mittal families as well as family members of Shri Madhusudan Agrawalji.
The beautiful spiritual event was conducted by Shri Sunil Kumar Dhanuka who was the Master of the Ceremony.

सफ़लतापूर्वक आयोजन होने पर दिल्ली, दक्षिणी मण्डल को परमपूज्य महाराजश्री का विशेष आशीर्वाद

सफ़लतापूर्वक आयोजन होने पर दिल्ली, दक्षिणी मण्डल को परमपूज्य महाराजश्री का विशेष आशीर्वाद

सफ़लतापूर्वक आयोजन होने पर दिल्ली, दक्षिणी मण्डल को परमपूज्य महाराजश्री का विशेष आशीर्वाद

20 अप्रैल 2019 सायं को विश्व जाग्रति मिशन दक्षिणी मण्डल के पुरूष एवं महिला कार्यकर्ताओं ने स्थानीय सिरी फोर्ट ओडिटोरियम में ‘आनन्द की खोज’ शीर्षक के अन्तर्गत परमपूज्य महाराजश्री एवं विश्व विख्यात योग-ध्यान गुरु डॉ. अर्चिका दीदी के पावन सानिध्य में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। सभी कार्यकर्ताओं ने पूर्ण मनोयोग से इस कार्यक्रम को अत्यंत सफल बनाया और विश्व जाग्रति मिशन के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ा। दक्षिणी मण्डल के अधिकारीगणों के आग्रह पर महाराजश्री ने सेवादारों को आशीर्वाद देने के लिए महाराजश्री जी ने 15 जून 2019 का अवसर दे अनुग्रहित किया।

निश्चित दिन व समय पर मण्डल के सौ से अधिक कार्यकर्ताओं ने निर्धारित स्थान पर पहुंच कर गुरुप्रेम व शुकराने के मधुर भजनों से वातावरण को तरंगित कर दिया। महाराजश्री जी के पावन नाम के जयघोष से पूरे आश्रम परिसर में उत्साह व प्रेम की लहरें गुन्जायमान हो रही थी। कार्यकर्ताओं के मुखमण्डल तब प्रसन्नता से चमक उठे जब अचानक पूज्य महाराजश्री जी ने मिशन के अधिकारीगणों के साथ प्रवेश किया। महाराजश्री जी के व्यासपीठ पर आसीन होने के पश्चात् दक्षिणी मण्डल के प्रधान श्री बी.डी. वाधवा जी ने महाराजश्री जी का स्वागत करवाया। तत्पश्चात् महाराजश्री जी ने सभी को कार्यक्रम के अनुशासन व सुचारू रूप से की गई सेवा के लिए बधाई दी।

निराकार परम सत्ता के साकार स्वरूप सदगुरु के समक्ष बैठे शिष्यगण भी अपने बैठे शिष्यगण भी अपने आत्मिक रूप में आ जाते हैं। सद्गुरू व सद्शिष्य के मध्य का शाब्दिक अदान-प्रदान वास्तव में परमात्मा और जीवात्मा के बीच का निःशब्द संवाद ही होता है। ऐसे में गुरूसत्ता के पावन मुखारविंद से उद्धत शब्द शिष्यों को निश्चित दिशा प्रदान कर उनकी जीवन दशा को ऊंचाइयों की ओर ले जाते हैं। महाराजश्री का पवित्र निर्देश था कि आप सब शिष्य अपने जीवन को अर्थपूर्ण बनाओ। भगवान ने जब आपको सद्गुरू के साथ जोड़ा है तो इसका तात्पर्य है कि आप अपने सत्कर्मों के कारण पंक्ति में खड़े थे और अब अवसर आ चुका है। परिवार और जीविका उपार्जन के साथ-साथ अपनी आत्मा को ऊपर उठाओ। जागृत हुए हो तो अब अपनी जीवन यात्रा को निरन्तर आगे बढ़ाओ। यह परोपकार के कार्य ही ऐसे अवसर होते हैं। आप धर्म का प्रचार-प्रसार करते आत्मा के करीब होते चले जाते हैं।

अंत में शिष्यों की उत्कंठा व प्रधान जी के आग्रह को स्वीकार कर महाराजश्री जी ने शिष्यों के पास स्वयं चलकर उनके शीर्ष को स्पर्श कर अपनी ऊर्जा का संचार किया।

ततपश्चात बी.डी. वाधवा जी ने इस मण्डल के निरन्तर चलते कियाकलापों को महाराजश्री के समक्ष रखा।

उल्लेखनीय है कि गुरूदर्शन का यह दुर्लभ अवसर शिष्यों की आध्यात्मिक यात्रा को एक गहराई व सघनता का उपहार दे गया।

राम तजुँ मैं गुरु न बिसारूँ

सन्त चरणदास, जो हरियाणा के मूल निवासी थे और बाद में दिल्ली के चान्दनी चौक इलाके में आकर यहीं बस गये थे। चरनदास सन्त थे, किन्तु साथ ही बहुत बड़े राष्ट्रभक्त थे। 1839 में उन्होंने अंग्रेजों के आक्रमणें और शासन का विरोध किया था। उनकी दो शिष्याएं सहजोबाई और दयाबाई थीं। दोनों ही परम गुरुभक्त थी। सहजोबाई ने तो गुरु को भगवान से भी बड़ा माना है। वह राम को छोड़ सकती है, किन्तु गुरु को नहीं। सहजो बाई द्वारा गाया गया फ्राम तजुँ मैं गुरु न बिसाऊँय् उन का उस भावना को प्रकट करता है। पूज्य गुरुदेव जी महाराज ने इस भजन को रोहिणी में आयोजित गुरुपूर्णिमा पर्व में वर्ष 2019 में मधुर वाणी में गाकर हजारों-हजारों भत्तफ़ों का मन मोह लिया था गुरुदेव जी ने भजन गाने के साथ-साथ उसकी ऐसी मनमोहक व्याख्या दी थी, जो अत्यन्त मार्मिक और हृदयस्पर्शी थी।

गुरुदेव बिखेरती स्पन्दनयुक्त गुरुदेव जी के विनम्र आत्मीय भाव में जैसे सहजोबाई के मन के भाव उजागर हो रहे थे और सहजोबाई ने भी तो सार-दर-सार सत्य को प्रकट किया था, सहजो कहती है, गुरु के सम हरि को न निहाऊं, अर्थात

जिस मन से, भाव से, आदर से, समर्पण से, श्रद्धा-आस्था से मैं अपने गुरु को देखती हूं, उससे हरि को न देखूं। गुरु के दर्शन करके शिष्य कितना धन्य होता है, उसका मन कितना प्रफुल्लित होता है, उसे तो वही आन और मान सकता है, जिसके अपने भाव भी वैसे ही हो। तरसी हैं आंखें सद्गुरु तेरे दर्शन को, तेरे दीदार को, बहुत बड़ी कोशिश है तेरी हस्ती में। गुरुदर्शन से मन को एक चैन सा आ जाता है, जैसे कोई बहुत बड़ा अनमोल खजाना पा लिया, अपने हृदय-रूपी मंदिर में सजा लिया। दूर-दूर से, देश-विदेश से सैंकड़ों हजारों भक्त जो आते हैं गुरुदर्शन के लिए, गुरु-आशिष पाने के लिए, हम यह रोजाना — महसूस करते हैं, तो सहजो ने सच ही कहा हरि ने जल दिया जग मांहि, गुरु ने आवागमन छुड़ाई चौरासी लाख योनियों के चक्कर काटते रहो, जन्म-मृत्यु-जन्म, यह सिलसिला तो खत्म नहीं होती, पर गुरु ने ऐसी सीख सिखाई, ऐसी तरकीब बताई कि आवागमन की बात ही खत्म कर दी।

फिर सहजो बाई कहती है, हरि ने कुटुम्ब जाल में गेरी, गुरु ने काटी ममता मेरी। भगवान ने इन्सान को दुनिया में भेजा और रिश्तेदारी का, मोह का ऐसा जाल तैयार कर दिया कि उसमें से निकलना ही दूभर हो गया। इन्सान की सारी उमर कट जाती है, मोह ममता में घरवालों की सेवा करते-करते, रिश्ते निभाते-निभाते, जिस का आप से स्वार्थ पूरा हो, वह तो खुश और जिस को कुछ कहा, बस नाराज, करतेे रहो सेवा सब की, तो आप अच्छे हो, गुरु ने मोह ममता की डोरी ही काट दी, सारा जंगल ही खत्म कर दिया आसान तो नहीं है यह, पर मन पक्का कर लो, गुरु का आदेश मान लो, सच्चाई को जान लो, गुरु की मान लो, तो कल्याण हो जायेगा। गुरुदेव कहते हैं, परिवार से प्रेम करो, पर मोह में मत फंसों। यही तो राज़ है जिन्दगी में खुशी का आनन्द का।

सहजोबाई आगे सन्देश देती है, हरि ने रोग-भोग उलझायो, गुरु जोगी कर सब छूड़ायो भगवान ने तो शरीर दिया, शरीर तो रोगों का घर है, भोगों में लालायित क्षणिक सुख की अनुभूति में शरीर को रोगी बना लेता है मनुष्य, काम, क्रोध, मोह, लोभ में कितने गलत काम करता है और सारी मुसीबतें अपने लिये स्वयं खरीदता है आदमी और गुरु शिष्य के इन भोगों के प्रति उदासीन बना कर उसे मुक्त कर देता है।

और सबसे बड़ा गिला है सहजोबाई को, भगवान से, ईश्वर सारे काम करता है, सर्वशक्तिमान है, सर्वनियन्ता है, सब कुछ उसी के बस में हैं, सब कुछ करने वाला वो ही है, किन्तु नज़र नहीं आते, स्वयं को छुपा कर रखा हुआ है और गुरु, जिन्होंने ने इतने उपकार किये, उन के साक्षात दर्शन कर लो, सुरा स्वरूप को देख कर धन्य हो जाओ, बात कर लो आशीष ले लो, गुरु की कृपा पा लो, साक्षात दर्शन करो।

गुरु को इतनी कृपाओं से धन्य सहजोबाई अपने सद्गुरु चरणदास पर तन-मन वार कर कहती है, मैं ने सोच-समझकर ठीक फैसला किया कि गुरु न तजूँ, हीर को जत डारुँ। सहजोबाई की तरह दयाबाई ने भी अपने गुरु की बहुत महिमा गाई है। वह भी सन्त चरणदास की शिष्या थी। वह करती हैं, गुरु बिन ध्यान नहीं होवै, गुरु विन चौरासी मग जोवै। गुरु बिन राम भक्ति नहीं जागो गुरु बिना — कर्म नहीं त्यागै, गुरु ही दीन दयाल –, गुरु सरनै जो कोई जांई,– करै काग नूँ हंसा, मन को मेरत है सब संसा। दयाबाई की बानी में और भी बहुत विचार हैं, जो गुरु की महिमा का बखान करते हैं, जिनसे उसकी गुरु के प्रति, भक्ति के भाव उजागर होते हैं। आप दिल्ली में चांदनी चौक के अन्तिम छोर पर आज भी जायें, तो वहां चरणदास गली का एक बोर्ड लगा हुआ है।

ऐसी ही प्रीति हो अपने सद्गुरु से, ऐसी आस्था और विश्वास हो शिष्य को अपने गुरु के प्रति। सहजोबाई और दयाबाई की अपने गुरु के प्रति भक्तिभाव अनन्य है।

Unconditional Love and Devotion to the Guru

The relationship between a Perfect Guru (Master) and a disciple is an inevitable outcome of the intrinsic condition in the life of an aspirant. From the spiritual point of view, it is the most important relationship that a person can enter. Love that constitutes the core of discipleship stands by itself among the different types of love that prevail in ordinary social relations.

The love that the aspirant has for the Master is really the response evoked by the greater love the Master has for the aspirant: it is to be placed above all other loves. The fundamental requisite for a true disciple is an unquestioning love for the Master. All other streams of love ultimately join this great river of love for the Master and disappear in it. To serve the master is to serve one’s own Self in every other self.

Force of Faith

The aspirant, before he desires the grace of the master, should deserve it. The supply of divine grace comes only when he is fit to receive it. Guru’s grace descends upon those who feel utterly humble and faithful to him. Faith is confidence and trust in Guru. Faith is the firm conviction of the truth of what is declared by the preceptor by way either of testimony or authority, without any other evidence of proof. The disciple who has faith in the guru argues not, thinks not, reasons not and cogitates not. He simply obeys, obeys and obeys.

A disciple without devotion to his guru is like a flower without fragrance, a well without water, a cow without milk or a body without life. A true aspirant rejoices in the practice of guru Bhakti Yoga. Without taking recourse to this yoga one cannot practise the other yogas. Whatever may be acquired by asceticism, renunciation, charity, auspicious acts or by other yogas, all these are speedily acquired by practising Guru-Bhakti yoga. It is the magic wand in the hands of the disciple to cross the ocean of Samsara.

Shraddha or faith is that power which sustains the aspirant on the path towards perfection. It supports him during tests and pitfalls and in overcoming seemingly insurmountable obstacles. Therefore, always keep alive your Shraddha and Bhakti in your Gurudeva. Let your faith be crowned with success.

त्रिपुर सुन्दरी माता मंदिर में सभी साधक-साधिकाओं के कल्याण के लिए डॉ-अर्चिका दीदी ने विशेष पूजा की

मनाली 1 जून, 2019
विश्व जागृति मिशन के सौजन्य से परमपूज्य गुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज एवं ध्यान गुरु डॉ-अर्चिका दीदी के सानिध्य में आयोजित लघुचान्द्रायण तप साधना में साधक साधिकाओं के आत्मिक उत्थान के लिए ध्यान, यज्ञ, पूजन, आरती, मौन विविध प्रयोग कराए गए। उन्हें डिवाइन ब्लीस मेडिटेशन, आत्मसाधना योगनिद्रा आदि ध्यान, ऊर्जा ध्यान आदि का प्रयोग सिखाया गया। सभी साधक साधिकाओं को आदि शक्ति पराम्बा माता त्रिपुर सुन्दरी की उपासना करने का अवसर डॉ-अर्चिका दीदी के सानिध्य में प्राप्त हुआ। नग्गर स्थित प्राचीन त्रिपुर सुन्दरी माता मंदिर में सभी साधक-साधिकाओं के कल्याण के लिए डॉ-अर्चिका दीदी ने विशेष पूजा की। माता के आशीर्वाद स्वरूप सभी को दीदी ने अंगवस्त्र प्रदान किए। दीदी ने कहा माता त्रिपुर सुन्दरी 16 कलाओं को प्रदान करती हैं। इसलिए इनका नाम षोडसी भी है। भोग और मुक्ति की इच्छा रखने वालों के लिए माता त्रिपुरा सुन्दरी की उपासना परम कल्याणकारी है। इस अवसर पर ध्यान गुरु डॉ- अर्चिका दीदी के साथविश्व जागृति मिशन के महामंत्री श्री देवराज कटारिया, श्री यशपाल सचदेवा, श्री राजकुमार अरोड़ा, श्री पवन गुप्ता, श्री अखिलेश कपूर आदि अधिकारी भी उपस्थित थे।

आनन्द, सत्य, प्रेम और शान्ति बाहर नहीं अन्दर से मिलते हैं

“आनन्द न बीते हुए कल में है, न आने वाले कल में है, आनन्द उस पल में है जो आप जी रहे हैं”

”आनन्द खोजने से नहीं मिलता, सच्चिदानंद में खो जाने से मिलता है”

दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में हुई विशेष आध्यात्मिक सभा

आनन्द की खोज विषय पर हुई विचार गोष्ठी

वरिष्ठ लोकसेवी राकेश आहूजा व प्रेमनाथ बत्रा का हुआ सम्मान

दक्षिणी दिल्ली, 20 अप्रैल। देश की राजधानी दिल्ली के सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में आज शाम नई दिल्ली व एनसीआर के विभिन्न अंचलों से आनन्द-खोजी स्त्री पुरूष, युवक युवतियाँ एवं नई पीढ़ी के सदस्य बड़ी संख्या में जुटे। विश्व जागृति मिशन के दक्षिणी दिल्ली मण्डल के तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में विश्व जागृति मिशन के संस्थापक-संरक्षक आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि आनन्द न तो बीते हुए कल में है और न आने वाले कल में है, आनन्द तो उस पल में है जो आप जी रहे हैं। उन्होंने कहा कि आनन्द खोजने से नहीं मिलता, वह सच्चिदानंद यानी परम पिता परमात्मा में खो जाने से मिलता है। उन्होंने भूतकाल का रोना छोड़ने तथा भविष्य की कल्पनाओं में खोने की आदत का परित्याग करके ‘वर्तमान’ को ताकतवर बनाने का आहवान देशवासियों से किया। कहा कि वर्तमान ही जीवित पल है। दुनिया के सभी लोग दुखों से मुक्ति और सुखों की प्राप्ति चाहते हैं। आनन्द की प्राप्ति के लिए बेचैन हर व्यक्ति उस आनन्द को खोजने के लिए विविध प्रयत्न करता है। उन्होंने कहा कि हर चीज अपनी परिधि में घूमती हुई अपने केन्द्र की ओर बढ़ती है। जिस तरह गंगा सहित हर नदी महासागर में मिलकर पूर्णता प्राप्त करती है, उसी तरह मनुष्य अपने केन्द्र परमात्मा तक पहुँचकर ही आनन्द की पूर्णता प्राप्त कर पाता है।

मिशन प्रमुख ने कहा कि जीवन की यात्रा की सम्पूर्णता ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्ण मुद्चयते’ में ही है। उन्होंने कहा कि परब्रह्म परमेश्वर ही आनन्द है और आनन्द ही परब्रह्म है। अतः जीवन का आनन्द प्राप्त करने के लिए प्रभु तक पहुंचने की यात्रा करनी ही पड़ती है। कहा कि वस्तुतः आनन्द प्राप्ति ही मानव जीवन का लक्ष्य है।

इस अवसर पर डॉ. अर्चिका दीदी ने कहा कि जो व्यक्ति अपने भीतर ज्ञान को, प्रेम को, सत्य को, शान्ति को, आनन्द को खोजता है वह ही आनन्द पाता है। इन चीजों की खोज बाहर करने वालों को निराश ही होना पड़ता है। आनन्द, सत्य, प्रेम, शान्ति इत्यादि वस्तुतः आन्तरिक क्षेत्र की चीजें हैं। बाहर ये चीजें नहीं मिलतीं, बाहर तो टेंशन मिला करती है। आज दुर्भाग्य है कि हिमालय जैसा महाटेंशन लेकर व्यक्ति जीवन जी रहा है। इस दुर्भाग्य से लड़ने के लिए ईश्वरनिष्ठ होकर अन्तर्यात्रा के पथ को अपनाना जरूरी होता है। आनन्द प्राप्ति का यही एकमात्र पथ है। उन्होंने बाहर से भीतर की यात्रा का मार्ग पकड़ने का सुझाव सभी को दिया।

इस अवसर पर विश्व जागृति मिशन के वरिष्ठ अधिकारी श्री राकेश आहूजा एवं दक्षिणी दिल्ली मण्डल के संरक्षक श्री प्रेमनाथ बत्रा का सम्मान किया गया।

इसके पूर्व फरीदाबाद से आई अंजू मुंजयाल की अगुवाई में युवा गायकों के संगीत दल ने कई भजन प्रस्तुत किये। विश्व जागृति मिशन के निदेशक श्री राम महेश मिश्र के मुख्य मंचीय समन्वयन में सम्पन्न इस विशेष संगोष्ठी में मिशन के महामन्त्री श्री देवराज कटारिया सहित समिति के वरिष्ठ पदाधिकारी तथा एनसीआर के विभिन्न मण्डलों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

दिल्ली में महर्षि वेदव्यास उपदेशक महाविद्यालय का हुआ उद्घाटन

मेजर जनरल जी.डी.बख्शी आनन्दधाम पहुँचे

महाविद्यालय में तैयार होंगे निष्णात् धर्मोपदेेशक

एक सच्चा धर्मोपदेशक युगों को बदलने की क्षमता रखता है

विजामि प्रमुख आचार्य सुधांशु जी महाराज ने कहा

आनन्दधाम-नयी दिल्ली, 19 अपै्रल। विश्व जागृति मिशन के अन्तरराष्ट्रीय मुख्यालय आनन्दधाम में हनुमान जयन्ती के पावन अवसर पर आज ‘महर्षि वेदव्यास उपदेशक महाविद्यालय’ का उद्घाटन महावीर की तरह के व्यक्तित्व वाले भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल श्री जी.डी. बख्शी के हाथों हुआ। मिशन प्रमुख, प्रख्यात मनीषी एवं अध्यात्मवेत्ता आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज की विशिष्ट उपस्थिति में सम्पन्न उद्घाटन समारोह में इस आध्यात्मिक आश्रम में ‘‘वीर भाव साधना’’ का अनूठा वातावरण विनिर्मित हो उठा।

विश्व जागृति मिशन परिवार में जनरल गगनदीप बख्शी का स्वागत करते हुए श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि ‘सेवक और सैनिक’ की संयुक्त अवस्था वाले श्रीराम भक्त हनुमान के जन्मोत्सव पर आरम्भ हुआ आज का यह अभिनव प्रकल्प भारत के भावी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने उपदेशक महाविद्यालय में चलाये जाने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रमों की भी जानकारी सभी को दी। कहा कि धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, राष्ट्रनिष्ठा सहित युगधर्म का सही एवं सम्यक् ज्ञान देने वाले धर्मोपदेशकों की इस देश व विश्व को महती आवश्यकता है।

श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि एक सच्चा धर्मोपदेशक युगों को बदलने की क्षमता रखता है। कहा कि वेद, उपनिषद, गीता, रामायण आदि पवित्र ग्रन्थों में पारंगत उपदेशक जो मनोविज्ञान व इतिहास के मर्मज्ञ भी होंगे, वे समाज व देश का सुन्दर निर्माण भी करेंगे। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस उपदेशक महाविद्यालय से निकले युवा न केवल अपने देश के कोने-कोने में पहुँचकर भारतीय धर्म एवं ऋषि संस्कृति की सही व सम्यक् जानकारी जनसामान्य तक पहुँचायेंगे, बल्कि विदेश की धरती पर भारतीय संस्कृति के आध्यात्मिक राजदूत बनकर सभी ओर संस्कृति का स्नेह-सिंचन करने में सफल होंगे। उन्होंने कहा कि इस दुनिया की सर्वोच्च उपलब्धि ईश्वर प्राप्ति यानी मोक्ष का अधिकारी या तो समाधिस्थ योगी होता है अथवा राष्ट्र की सीमा पर उसकी रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाला सैनिक।

बतौर मुख्य अतिथि जनरल जी. डी. बख्शी ने इस अवसर पर कहा कि उन्होंने 1947 के पूर्व कश्मीर के राजा हरि सिंह की सेना में रहे अपने पिता श्री एस.पी. बख्शी और 1965 में मात्र 23 साल की उम्र में भारत-पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए बड़े भाई कैप्टन रमन बख्शी की बहादुरी को समीप से देखा है। वह बोले कि अग्रज के दिवंगत शरीर की बजाय एक मटकी में आयीं उनकी अस्थियों को देखकर अगले साल 1966 में हमने एन.डी.ए. ज्वाइन किया था। पढ़ाई पूरी होते ही 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) के युद्ध के कारण एक महीने पहले ही सेना में कमीशन देकर मुझे युद्धभूमि पर भेज दिया गया था। मात्र 14 दिन में पाकिस्तान के दो टुकड़े करके 93,000 शत्रु सैनिकों को हमारी सेना ने बन्दी बनाया था, मैं उन गर्वीले क्षणों का न केवल प्रत्यक्षदर्शी रहा बल्कि उसका सक्रिय अंग भी रहा।

जनरल बख्शी ने आज के भारत के अजीबोगरीब परिदृश्य की चर्चा करते हुए सन्तों व संन्यासियों से बिना कोई देर किए ‘वीर-भाव-साधना’ के क्षेत्र मंें उतरने का आह्वान किया। उन्होंने अतीत काल में राष्ट्र रक्षा के लिए सन्तों द्वारा तलवार उठाने की इतिहास घटना भी सुनायी। जनरल बख्शी ने कहा कि भारतवर्ष जब कभी विश्व-गुरू बनेगा तो वह ताकत और ज्ञान दोनों के बल पर बनेगा। जनरल ने भारतीयों में ‘क्षात्र शक्ति’ उभारने के लिए विशेष अभियान चलाने पर बल दिया। उनने एक और महाभारत की अति आवश्यकता बतायी। कहा कि भारत मंें ही सदैव अवतार होते रहे हैं।

विश्व जागृति मिशन की उपाध्यक्ष ध्यान-योगगुरु डाॅ0 अर्चिका दीदी ने उपदेशक महाविद्यालय के रूप में मिले एक और अभिनव प्रकल्प के लिए महाविद्यालय प्रांगण में हजारों की संख्या में उपस्थित मिशन परिवार को बधाई दी। राष्ट्र की दिशाधारा बदल देने वाले अतीत के भारतीय विद्वान आचार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने आनन्दधाम गुरुकुल एवं उपदेशक महाविद्यालय के आचार्यों का आह्वान किया कि देश को सुयोग्य धर्मोपदेशक देने के इस महान गुरुकार्य में अपनी पूरी शक्ति नियोजित करें।

विश्व जागृति मिशन के निदेशक श्री राम महेश मिश्र के मुख्य समन्वयन एवं संचालन में सम्पन्न महर्षि वेदव्यास उपदेशक महाविद्यालय उद्घाटन समारोह में आभार ज्ञापन करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डाॅ0 सप्तर्षि मिश्र ने कहा कि ब्राह्मशक्ति व क्षात्रशक्ति के अभाव में हमारा देश इन दिनों आन्तरिक एवं बाह्य असुरक्षा की गम्भीर स्थितियों से गुजर रहा है। भगवान परशुराम के कथन ‘‘अग्रतश्चतुरो वेदान् पृष्ठतः सशरं धनुः, इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शास्त्रादपि शरादपि’’ का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस देश में एक धर्मोपदेशक शास्त्र व शस्त्र दोनों में निपुण रहा है। देश में वीरता के भाव का राष्ट्रीय जागरण करने के लिए आज पुनः इसकी बड़ी आवश्यकता है।

इसके पूर्व उपदेशक महाविद्यालय भवन में विशेष यज्ञ का आयोजन किया गया। पं0 सतीश चन्द्र द्विवेदी के आचार्यत्व में सम्पन्न इस यज्ञ में गुरुदेव श्री सुधांशु जी महाराज सहित कई गण्यमान व्यक्तियों ने भागीदारी की। उद्घाटन समारोह में विश्व जागृति मिशन के प्रधान श्री प्रेम सिंह राठौर, उपप्रधान श्री दौलत राम कटारिया, महामन्त्री श्री देवराज कटारिया, कोषाध्यक्ष श्री राज कुमार अरोड़ा, संयोजक डाॅ0 नरेन्द्र मदान, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी श्री एम.एल.तिवारी, जीवन संचेतना के सम्पादक डाॅ0 विजय कुमार मिश्र, केन्द्रीय अधिकारी श्री मनोज शास्त्री, नागपुर के श्री गौरीशंकर अग्रवाल, वाराणसी के श्री इन्द्रदेव दुबे, जालन्धर के श्री सुरेन्द्र चावला, आचार्य डाॅ0 शेष कुमार शर्मा, आचार्य अनिल झा सहित मिशन के विभिन्न मण्डलों के अधिकारी तथा नयी दिल्ली सहित एन.सी.आर. के विभिन्न अंचलों से आए मिशन कार्यकर्ता सम्मिलित हुए।

श्री सुधांशु जी महाराज ने कार्यकर्ताओं से सेवा कार्यों को तीव्र गति देने का किया आहवान

इन्दौर विराट भक्ति सत्संग महोत्सव सफलतापूर्वक सम्पन्न

Virat Bhakti Satsang Indore-14-Apr-2019 | Sudhanshu Ji Maharajइन्दौर, 14 अप्रैल (सायं)। विश्व जागृति मिशन द्वारा यहाँ दशहरा मैदान में आयोजित पाँच दिवसीय विराट भक्ति सत्संग महोत्सव आज सायंकाल विधिवत समापन हो गया। मिशन के इन्दौर मण्डल के तत्वावधान में आयोजित इस विशालकाय सत्संग समारोह में इन्दौर सहित मध्य प्रदेश के अनेक जनपदों तथा राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, उड़ीसा आदि प्रान्तों के ज्ञान जिज्ञासुओं ने सक्रिय प्रतिभागिता की।

विदाई सत्र में विश्व जागृति मिशन के संस्थापक-संरक्षक आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज ने मिशन के कार्यकर्ताओं को अपने में और अधिक आध्यात्मिक गहराई लाने तथा सेवा कार्यों को तेज करने का आहवान किया।

इस अवसर पर आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि यह समय बड़े बदलावों का है। इस दौर में हर देशवासी को अपनी भीतरी शक्ति का जागरण करना होगा। यह देश ऋषियों का देश है, गीता का देश है, रामायण का देश है। यह देश सदा से समस्त विश्व का मार्गदर्शन करता रहा है। तेजी से हो रहे वैश्विक परिवर्तनों के इस विशेष काल में हम भारतीयों को अपनी मौलिक ताकत को समझना होगा। उन्होंने श्रीमद्भवदगीता के विभिन्न उद्धरणों – प्रसंगों के साथ उपस्थित ज़न-समुदाय को अनेक प्रेरणाएँ दीं।

आज की सन्ध्या दिव्य भजनों व गीतों से सजी थी। आचार्य अनिल झा, कश्मीरी लाल चुग, महेश सैनी, राम बिहारी, स्वीटी शर्मा, क्षमा साध ने कई प्रेरक भजन सुनाकर उपस्थित जनसमुदाय में भावोददीपन किया। गायकों का वाद्य-यंत्रों पर साथ श्री रविशंकर, राहुल आनन्द एवं चुन्नी लाल तंवर ने दिया।

विदाई के पूर्व विराट भक्ति सत्संग महोत्सव के मुख्य संयोजक श्री कृष्ण मुरारी शर्मा सहित इन्दौर मण्डल के मिशन अधिकारियों-कार्यकर्ताओं ने अपने गुरुदेव आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज का नागरिक अभिनन्दन किया। सत्संग समारोह का समापन दिव्य आरती के साथ हुआ। नई दिल्ली से आए मिशन अधिकारी श्री प्रयाग शास्त्री ने बताया कि यहाँ लगे एक दर्जन स्टालों का लाभ कई हजार लोगों ने उठाया। ज्ञान जिज्ञासुओं ने आध्यात्मिक जागरण, साहित्य विस्तार, गौसेवा, वृद्धजन सेवा, अनाथ (देवदूत) शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा आदि गतिविधियों में रुचि ली। श्री कृष्ण मुरारी शर्मा ने गुरुदेव सहित आनन्द धाम से आए सभी अधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं तथा उपस्थित जनसमुदाय के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

पाँच दिवसीय सत्संग समारोह का समस्त मंचीय समन्वयन एवं संचालन विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली के निदेशक श्री राम महेश मिश्र ने किया। विदाई सत्र में प्रख्यात कवि श्री अशोक भाटी ने सभा संचालन के मध्य अपनी रचनाओं से जनमानस को मंत्रमुग्ध कर दिया।

दशहरा मैदान में पुरुषोत्तम श्रीराम के गुणों की हुई चर्चा

सेवाधाम आश्रम की दिव्यांग बालिकाओं ने भी सुना सत्संग

Virat Bhakti Satsang Indore 13-Apr-2019 | Sudhanshu Ji Maharajविराट भक्ति सत्संग महोत्सव का चौथा दिन

इन्दौर, 13 अप्रैल (सायं)। विश्व जागृति मिशन के इन्दौर मण्डल द्वारा आयोजित पाँच दिवसीय विराट भक्ति सत्संग महोत्सव के चौथे दिवस सांध्यकालीन सत्र में मिशन प्रमुख आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज ने रामनवमी के परिप्रेक्ष्य में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की विस्तार से चर्चा की। रामलीला ग्राउण्ड यानी दशहरा मैदान में प्रवचन करते हुए उन्होंने कहा कि राम एक युगान्तकारी प्रभाव का नाम है, जो कभी भी कम नहीं हो सकता। श्रीराम का प्रभाव किसी भी युग में कम नहीं हो सकता। उन्होंने प्रभु श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप पर विशद चर्चा की।

भारतीय संस्कृति को श्रीराम की अद्भुत संस्कृति बताते हुए श्री सुधांशु जी महाराज ने भारतवर्ष के मानवीय जीवन के हर पक्ष को आध्यात्मिक संस्कृति बताया। त्यागवादी संस्कृति को देव संस्कृति की संज्ञा देते हुए उन्होंने इसकी विलोमार्थी संस्कृति यानी भोगवादी संस्कृति से बचने को कहा। श्रद्धेय महाराजश्री ने कहा कि श्रीराम से आत्मदर्शन की प्रेरणा मिलती है और रावण से प्रदर्शन की।

श्रीराम को समय की सीमाओं से परे बताते हुए मिशन प्रमुख ने कहा कि राम कभी के हैं, तभी के हैं और सभी के हैं। उन्हें किसी युग, किसी काल में आबद्ध नहीं किया जा सकता। कहा कि श्रीराम से परमार्थ की प्रेरणा मिलती है तथा रावण से स्वार्थ की। उन्होंने धीर, वीर, गम्भीर, प्रसन्न-वदन, शान्त, मर्यादित श्रीराम से उनके गुणों को लेकर उन्हें अपने अन्तरमन में उतारने को कहा। श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि अब समय आ गया है कि हम रामत्व व रावणत्व में से किसी एक का चयन कर लें, नीति और अनीति के दो मार्गों में से सही मार्ग का चयन कर लें। उन्होंने श्रीराम को मर्यादा का मुकुटमणि कहा और वनगमन के समय अनुज, धर्मपत्नी, माता कौशल्या, पिता राजा दशरथ सभी के अविचलित होने पर उनको भी मर्यादा सिखलाने की त्रेतायुग की इतिहास घटनाएँ सुनायीं।

श्री सुधांशु जी महाराज ने राम की संस्कृति को, अपनी आर्य संस्कृति को, अपनी भारतीय संस्कृति को, निज देव संस्कृति को अपनाने का आहवान देशवासियों से किया। उन्होंने कहा कि अपने जीवन, परिवार, समाज, राष्ट्र को समृद्ध एवं आत्मनिर्भर बनाएँ। विकास की इस प्रक्रिया में उन्होंने श्रीराम की मर्यादाओं के धरातल को कभी नहीं छोड़ने की सलाह दी। इस मौके पर मध्य प्रदेश के वरिष्ठ कवि श्री अशोक भाटी ने अनाथ (देवदूत) बच्चों पर आधारित बड़ी सुन्दर रचना पढ़ी।

विश्व जागृति मिशन के इन्दौर मण्डल के वरिष्ठ अधिकारी एवं सत्संग महोत्सव के मुख्य संयोजक श्री कृष्ण मुरारी शर्मा ने बताया कि सत्संग समारोह का समापन कल रविवार सायंकाल होगा। गुरूमंत्र दीक्षा का कार्यक्रम मध्यान्हकाल सम्पन्न होगा।

परमात्मा का साथ ही है असली और स्थायी साथ

”तेरा है नाम दुनिया में पतित पावन सभी जानें”

Virat Bhakti Satsang Indore-12-Apr-2019 | Sudhanshu Ji Maharajविराट भक्ति सत्संग महोत्सव का दूसरा दिवस

इंदौर, 11 अप्रैल (सायं)। जीवन लगातार गतिमान है, स्वांसों की सीमित संख्या सबके पास है, बहुत बार ढेर सारे सपने देखते हुए व्यक्ति के अनेक सपने अधूरे रह जाते हैं। जब व्यक्ति का कोई भी सहारा नहीं रह जाता, तब उसका साथ ईश्वर देता है। वह परमेश्वर जिसे हम कभी याद नहीं कर पाए, वह ही काम आता है। मनुष्य का आखिरी व असली सहारा भगवान होते हैं, उन्हें कभी भी भुलाना नहीं चाहिए।

यह उदगार आज सायंकाल विश्व जागृति मिशन नई दिल्ली के संस्थापक-संरक्षक आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज ने रामलीला मैदान में चल रहे विराट भक्ति सत्संग महोत्सव के विशालकाय सभागार में हजारों की संख्या में मौजूद ज्ञान जिज्ञासुओं के बीच प्रवचन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि सफलता के दिनों में व्यक्ति के कदम निरन्तर आगे बढ़ाते जाते हैं लेकिन असफलता-जनित निराशा के समय में चार पग आगे बढ़ते हैं तो सहसा तीन कदम पीछे को आ जाते हैं। ऐसे में अन्तरतम में पूरी ईशनिष्ठा बनाये रखते हुए आगे बढ़ना चाहिए। शनै: शनै: परिस्थितियाँ बदलती हैं और मनुष्य पूर्ण आशावाद के साथ सफलता की ऊँची सीढ़ियों पर चढ़ता चला जाता है।

विजामि प्रमुख ने उपस्थित ज्ञान जिज्ञासुओं को जीवन में स्थाई प्रगति के अनेक आध्यात्मिक सूत्र दिए और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अपनी शुभ कामनाएं कहीं। उन्होंने देश के युवाओं को राष्ट्र का कर्णधार बताया और कहा कि हमारी युवा शक्ति को और अधिक सजगता के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है। उन्होंने युवाओं से अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने तथा बुराइयों व कुरीतियों से बचने का आह्वान किया।

विश्व जागृति मिशन के नई दिल्ली स्थित मुख्यालय आनन्दधाम से आये मिशन प्रतिनिधि श्री प्रयाग शास्त्री ने बताया कि सत्संग स्थल पर एक दर्जन से अधिक स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें युगऋषि आयुर्वेद, साहित्य सेवा, धर्मादा सेवा, स्वास्थ्य सेवा, गौशाला सेवा, वृद्धजन सेवा इत्यादि शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इन स्टालों का लाभ भारी संख्या में इंदौरवासी उठा रहे हैं।

मिशन निदेशक श्री राम महेश मिश्र ने बताया कि संस्था द्वारा अनाथ (देवदूत) बालक-बालिकाओं के लिए चलाए गए शिक्षा कार्यक्रम को समाज के हर वर्ग से खासी सराहना मिली है। उन्होंने इस कार्यक्रम में और गति देने एवं बढ़ाने में सहयोग करने का आहवान किया।